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	<title>Comments on: फिर बहाये गये घड़ियाली टसुये</title>
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	<description>निंदक नीयर राखिये</description>
	<pubDate>Thu, 24 Jul 2008 22:56:05 +0000</pubDate>
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		<title>By: हिंदिनी &#187; गाँधीवाद बनाम कृष्णनीति</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/123#comment-169</link>
		<dc:creator>हिंदिनी &#187; गाँधीवाद बनाम कृष्णनीति</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 02 May 2006 13:45:30 +0000</pubDate>
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		<description>[...] अब क्या क्या गिनाया जाये, इस गाँधीवाद के साथ एक और ख्याल मन में आता है। अपने देबू भाई का लेख पढ़ा, यहाँ फिर अर्थ का अनर्थ निकालने की गुस्ताखी कर रहा हूँ पर यार एक बात नही समझ आती कि अगर किसी को भारत में ढँग का काम न मिले तो क्या बाहर काम करने वाले भारत के सपूत नही रह जाते? उन्हे ईंश्योररेंस देकर वह भी उन्ही के पैसो से यह कर पल्ला झाड़ लिया जाये कि बेटा अगर बाहर तुम्हें कोई तालीबानी तुम्हारी भारतीय पहचान की वजह से मारे , या फिर एरिजोना में कोई तुम्हारी पगड़ी की वजह से तुम्हें तालीबानी समझ कर भून दे तो पलट कर हिंदुस्तान की तरफ मत देखना क्योंकि रोटी के चँद टुकड़ों की खातिर तुमने सात समुँदर पार का पानी पीने का अपराध किया है। [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] अब क्या क्या गिनाया जाये, इस गाँधीवाद के साथ एक और ख्याल मन में आता है। अपने देबू भाई का लेख पढ़ा, यहाँ फिर अर्थ का अनर्थ निकालने की गुस्ताखी कर रहा हूँ पर यार एक बात नही समझ आती कि अगर किसी को भारत में ढँग का काम न मिले तो क्या बाहर काम करने वाले भारत के सपूत नही रह जाते? उन्हे ईंश्योररेंस देकर वह भी उन्ही के पैसो से यह कर पल्ला झाड़ लिया जाये कि बेटा अगर बाहर तुम्हें कोई तालीबानी तुम्हारी भारतीय पहचान की वजह से मारे , या फिर एरिजोना में कोई तुम्हारी पगड़ी की वजह से तुम्हें तालीबानी समझ कर भून दे तो पलट कर हिंदुस्तान की तरफ मत देखना क्योंकि रोटी के चँद टुकड़ों की खातिर तुमने सात समुँदर पार का पानी पीने का अपराध किया है। [...]</p>
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		<title>By: Debashish</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/123#comment-168</link>
		<dc:creator>Debashish</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 02 May 2006 11:49:15 +0000</pubDate>
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		<description>आपके विचार इस विषय पर लोकप्रिय मत के करीब है और तर्क सही भी हैं। दरअसल सत्यनारायण की मौत से ही यह बहस जन्मी है कि पर्याप्त बीमा और एडवाईज़रीज़ यथास्थान होते तो शा्यद ये वाकये न होते और गर होते तो परिवार की आर्थिक हाल पर असर नहीं पड़ते। तालिबानी कट्टरपंथी पहले भी भारतीयों की जान लेते रहे हैं। हम उनसे किसी व्यवहारिकता की उम्मीद ना सही पर अपने नागरिकों और सरकार से तो रख ही सकते हैं।

बढ़ते वैश्विक बाजार में सिर्फ पॉलीटिकल करेक्टनेस से काम नहीं चलने वाला। दरकार होगी नियमों और दृष्टिकोण में बदलाव की।

&lt;blockquote&gt;...हर उस परिवार को किसी कमाऊ पूत के गुजर जाने पर सरकारी सहायता मिलनी चाहिए जिनकी आय का कोई और ठोस ज़रिया...नहीं हो...चाहे मारे गए व्यक्ति की जान तालेबान ने ली हो, किसी अपराधी ने&lt;/blockquote&gt; 

बिल्कुल सहमत हूँ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपके विचार इस विषय पर लोकप्रिय मत के करीब है और तर्क सही भी हैं। दरअसल सत्यनारायण की मौत से ही यह बहस जन्मी है कि पर्याप्त बीमा और एडवाईज़रीज़ यथास्थान होते तो शा्यद ये वाकये न होते और गर होते तो परिवार की आर्थिक हाल पर असर नहीं पड़ते। तालिबानी कट्टरपंथी पहले भी भारतीयों की जान लेते रहे हैं। हम उनसे किसी व्यवहारिकता की उम्मीद ना सही पर अपने नागरिकों और सरकार से तो रख ही सकते हैं।</p>
<p>बढ़ते वैश्विक बाजार में सिर्फ पॉलीटिकल करेक्टनेस से काम नहीं चलने वाला। दरकार होगी नियमों और दृष्टिकोण में बदलाव की।</p>
<blockquote><p>&#8230;हर उस परिवार को किसी कमाऊ पूत के गुजर जाने पर सरकारी सहायता मिलनी चाहिए जिनकी आय का कोई और ठोस ज़रिया&#8230;नहीं हो&#8230;चाहे मारे गए व्यक्ति की जान तालेबान ने ली हो, किसी अपराधी ने</p></blockquote>
<p>बिल्कुल सहमत हूँ।</p>
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	<item>
		<title>By: मुकुन्द</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/123#comment-167</link>
		<dc:creator>मुकुन्द</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 02 May 2006 10:21:52 +0000</pubDate>
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		<description>हिन्दी ब्लोगर ने ज्यादा सही लिखा है</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हिन्दी ब्लोगर ने ज्यादा सही लिखा है</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Hindi Blogger</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/123#comment-166</link>
		<dc:creator>Hindi Blogger</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 01 May 2006 22:05:38 +0000</pubDate>
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		<description>सौभिक का तर्क काफ़ी हद तक ठीक लगता है, लेकिन उसे शत-प्रतिशत ठीक नहीं कहा जा सकता. 

सूर्यनारायण को मारा गया इसलिए नहीं कि वो बहरीन की किसी कंपनी की ओर से ज़्यादा पैसे की लालच में अफ़गानिस्तान में काम कर रहे थे. उन्हें मारा गया इसलिए कि वो भारतीय नागरिक थे. ग़ौर करें तालेबान की माँग पर. तालेबान ने चौबीस घंटे के भीतर सभी भारतीयों को अफ़ग़ानिस्तान से निकल जाने को कहा. कहने का मतलब ये कि तालेबान की नज़र में सूर्यनारायण का सबसे बड़ा ज़ुर्म उसका भारतीय होना था. ऐसे में उसके परिवार के भरन-पोषण की कुछ-न-कुछ ज़िम्मेवारी तो भारत सरकार की बनती ही है.

जहाँ तक मुआवज़े की बात है तो हर उस परिवार को किसी कमाऊ पूत के गुजर जाने पर सरकारी सहायता मिलनी चाहिए जिनकी आय का कोई और ठोस ज़रिया जैसे बीमा, अनुकंपा आधार पर नौकरी आदि नहीं हो. अब चाहे मारे गए व्यक्ति की जान तालेबान ने ली हो, किसी अपराधी ने या किसी धनपशु ने, या फिर उसकी मौत किसी दुर्घटना में ही क्यों न हुई हो. (यहाँ हमें पश्चिमी देशों से तुलना करने की ज़रूरत नहीं क्योंकि वहाँ की सरकारें वैसे भी किसी को भूखा-नंगा-बेघर नहीं रहने देती.)

सूर्यनारायण के मामले में तो सरकार की कोई एडवाइज़री भी नहीं थी. पश्चिमी देशों के युद्धविरोधी कार्यकर्ता सरकारी सलाह की अनसुनी कर इराक़ जैसी ख़तरनाक जगह पर जाकर आतंकवादियों के चंगुल में फंस जाते हैं, इतना पर भी उन्हें छुड़ाने के लिए उनकी सरकारें एड़ी-चोटी एक कर देती हैं. ख़ुशी की बात है भारत सरकार ने भी हर ऐसे मौक़े पर राजनयिक सक्रियता दिखाई है, भले ही मीडिया के दबाव में आकर वो ऐसा करती हो.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सौभिक का तर्क काफ़ी हद तक ठीक लगता है, लेकिन उसे शत-प्रतिशत ठीक नहीं कहा जा सकता. </p>
<p>सूर्यनारायण को मारा गया इसलिए नहीं कि वो बहरीन की किसी कंपनी की ओर से ज़्यादा पैसे की लालच में अफ़गानिस्तान में काम कर रहे थे. उन्हें मारा गया इसलिए कि वो भारतीय नागरिक थे. ग़ौर करें तालेबान की माँग पर. तालेबान ने चौबीस घंटे के भीतर सभी भारतीयों को अफ़ग़ानिस्तान से निकल जाने को कहा. कहने का मतलब ये कि तालेबान की नज़र में सूर्यनारायण का सबसे बड़ा ज़ुर्म उसका भारतीय होना था. ऐसे में उसके परिवार के भरन-पोषण की कुछ-न-कुछ ज़िम्मेवारी तो भारत सरकार की बनती ही है.</p>
<p>जहाँ तक मुआवज़े की बात है तो हर उस परिवार को किसी कमाऊ पूत के गुजर जाने पर सरकारी सहायता मिलनी चाहिए जिनकी आय का कोई और ठोस ज़रिया जैसे बीमा, अनुकंपा आधार पर नौकरी आदि नहीं हो. अब चाहे मारे गए व्यक्ति की जान तालेबान ने ली हो, किसी अपराधी ने या किसी धनपशु ने, या फिर उसकी मौत किसी दुर्घटना में ही क्यों न हुई हो. (यहाँ हमें पश्चिमी देशों से तुलना करने की ज़रूरत नहीं क्योंकि वहाँ की सरकारें वैसे भी किसी को भूखा-नंगा-बेघर नहीं रहने देती.)</p>
<p>सूर्यनारायण के मामले में तो सरकार की कोई एडवाइज़री भी नहीं थी. पश्चिमी देशों के युद्धविरोधी कार्यकर्ता सरकारी सलाह की अनसुनी कर इराक़ जैसी ख़तरनाक जगह पर जाकर आतंकवादियों के चंगुल में फंस जाते हैं, इतना पर भी उन्हें छुड़ाने के लिए उनकी सरकारें एड़ी-चोटी एक कर देती हैं. ख़ुशी की बात है भारत सरकार ने भी हर ऐसे मौक़े पर राजनयिक सक्रियता दिखाई है, भले ही मीडिया के दबाव में आकर वो ऐसा करती हो.</p>
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		<title>By: युगल मेहरा</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/123#comment-165</link>
		<dc:creator>युगल मेहरा</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 01 May 2006 18:52:39 +0000</pubDate>
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		<description>वाकई में सौभिक ने सही लिखा है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वाकई में सौभिक ने सही लिखा है।</p>
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