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	<title>Comments on: जस्ट वाना हैव फ़न</title>
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	<description>निंदक नीयर राखिये</description>
	<pubDate>Thu, 28 Aug 2008 18:19:57 +0000</pubDate>
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		<title>By: रजनीश मंगला</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/127#comment-199</link>
		<dc:creator>रजनीश मंगला</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 18 May 2006 15:35:56 +0000</pubDate>
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		<description>अतुल भाई बढ़िया लिखा है</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अतुल भाई बढ़िया लिखा है</p>
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	<item>
		<title>By: Debashish</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/127#comment-187</link>
		<dc:creator>Debashish</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 15 May 2006 17:32:43 +0000</pubDate>
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		<description>टिप्पणियों के लिये सभी पाठकों का शुक्रिया!

&lt;blockquote&gt;पश्चिमी देशों के बीच आमतौर पर हर तरह की चीज़ों और गतिविधियों के बीच एक स्पष्ट विभाजक लकीर होती है. भारत में वो लकीर या तो रहती ही नहीं, और यदि रहती है तो न दिखने लायक अस्पष्टता लिए हुए।&lt;/blockquote&gt;
&lt;b&gt;हिन्दी ब्लॉगरः&lt;/b&gt; सौ टके खरी बात की आपने। 

&lt;b&gt;मुकुन्द, दीपक, अनुनादः&lt;/b&gt; अखबार के लेख भले नाटकीयता लिये हों, थोड़े अतिश्योक्तिपूर्ण भी हों पर सरासर गलत होते हों यह नहीं मानता मैं। हैं तो समाज का अक्स ही। जो हो रहा है बड़े शहरों में, उच्च धनाढ्य वर्गों में वो तो, जैसा कि मैंने कहा कि, हमें केवल अखबारों से जानने की ज़रूरत तो नहीं। 

&lt;b&gt;अतुलः&lt;/b&gt; बढ़िया लिखा आपने, वाकई में टिप्पणी पूरी पोस्ट बनने के लायक है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>टिप्पणियों के लिये सभी पाठकों का शुक्रिया!</p>
<blockquote><p>पश्चिमी देशों के बीच आमतौर पर हर तरह की चीज़ों और गतिविधियों के बीच एक स्पष्ट विभाजक लकीर होती है. भारत में वो लकीर या तो रहती ही नहीं, और यदि रहती है तो न दिखने लायक अस्पष्टता लिए हुए।</p></blockquote>
<p><b>हिन्दी ब्लॉगरः</b> सौ टके खरी बात की आपने। </p>
<p><b>मुकुन्द, दीपक, अनुनादः</b> अखबार के लेख भले नाटकीयता लिये हों, थोड़े अतिश्योक्तिपूर्ण भी हों पर सरासर गलत होते हों यह नहीं मानता मैं। हैं तो समाज का अक्स ही। जो हो रहा है बड़े शहरों में, उच्च धनाढ्य वर्गों में वो तो, जैसा कि मैंने कहा कि, हमें केवल अखबारों से जानने की ज़रूरत तो नहीं। </p>
<p><b>अतुलः</b> बढ़िया लिखा आपने, वाकई में टिप्पणी पूरी पोस्ट बनने के लायक है।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: प्रेमलता पांडे</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/127#comment-186</link>
		<dc:creator>प्रेमलता पांडे</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 15 May 2006 17:16:01 +0000</pubDate>
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		<description>अतुल जी आपकी टिप्पणी बहुत ही उच्च कोटि की है। आजकल शिक्षा जगत एक तरह से संक्रमण काल से ग़ुजर रहा है, वैश्वीकरण के  प्रभाव तो समाज में नज़र आने लगे हैं परंतु  शिक्षा में परिवर्तन अभी दिखायी देने में कुछ समय लग सकता है; जबकि  पाठ्यक्रम में समय की मांग के अनुसार बदलाव और वृद्धि कर दी गयी है परंतु इसका आउटपुट आने में देर प्रक्रिया का ही हिस्सा है।

इस बीच समाज के उच्च शिक्षित वर्ग की ज़िम्मेवारी बढ़ जाती है कि वह रोल माडल बनकर मध्यम और निम्न वर्ग को राह दिखाएं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अतुल जी आपकी टिप्पणी बहुत ही उच्च कोटि की है। आजकल शिक्षा जगत एक तरह से संक्रमण काल से ग़ुजर रहा है, वैश्वीकरण के  प्रभाव तो समाज में नज़र आने लगे हैं परंतु  शिक्षा में परिवर्तन अभी दिखायी देने में कुछ समय लग सकता है; जबकि  पाठ्यक्रम में समय की मांग के अनुसार बदलाव और वृद्धि कर दी गयी है परंतु इसका आउटपुट आने में देर प्रक्रिया का ही हिस्सा है।</p>
<p>इस बीच समाज के उच्च शिक्षित वर्ग की ज़िम्मेवारी बढ़ जाती है कि वह रोल माडल बनकर मध्यम और निम्न वर्ग को राह दिखाएं।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
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		<title>By: Atul</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/127#comment-185</link>
		<dc:creator>Atul</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 15 May 2006 15:19:07 +0000</pubDate>
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		<description>देबू भाई

एक व्यक्ति एक बार एक महात्मा के पीछे पड़ गया कि मुझे ब्रह्मज्ञान का मँत्र दे दो। महात्मा ने पिँड छुड़ाने को एक कागज पर कुछ अगड़म बगड़म लिख के दे दिया और कहा कि जाओ, इसका जाप पाँच दिन तक नहाने के बाद पाँच बार करो। पर ध्यान रहे कि मँत्र जाप के समय बँदर का ध्यान न आये। आदमी बोल, यह तो बहुत आसान है और बँदर का ध्यान भला क्यो आने लगा, अब तो मैं पाँच दिन में ब्रह्मज्ञानी बन जाऊँगा। पर बेचारा जब से घर पहुँचा बँदर का ख्याल पीछा न छोड़े, बीबी तक बँदरिया दिखे, शीशे में खुद को देखे तो बँदर दिखे। लड़का पूछे कि क्या बड़बड़ा रहे हो तो उसे भी धुत्कारे कि हट बँदर कहीं का। हाल यह कि तीसरे दिन ही वापस भागा महात्मा के पास कि यह क्या दे दिया अब तो हर तरफ बँदर ही नजर आते हैं। दरअसल बँदर कही नही उसके दिल में ही था। 

यही हाल भारतीय समाज का है, बरसों से सेक्स को हौव्वा समझ कर अलमारी में बँद करकर रखा है। उसकी शिक्षा कभी नही दी गई। जो कुछ जाना गया वह मस्तराम की सस्ती अधकचरी जानकारी से मिला। उसी का नतीजा है कि आज &lt;a href="http://myrajasthan.blogspot.com/2006/05/harmful-oldman.html" rel="nofollow"&gt;बुढ्ढे&lt;/a&gt;  भी त्रस्त है  और &lt;a href="http://www.jitu.info/merapanna/?p=419" rel="nofollow"&gt;जवान&lt;/a&gt; भी । इस बारे में  &lt;a href="http://www.kalpana.it/hindi/blog/2006/05/blog-post_114744806571763397.html" rel="nofollow"&gt;ज्ञानपरक&lt;/a&gt;  जानकारी और च्रचा के अभाव ने इसे अब तक हौव्वा बना कर रखा है पर जिस तरह बच्चा जिस काम को मना करो उसी को कौतूहूलवश करना चाहता है कुछ वही सब भारतीय जनमानस के साथ भी हुआ। यह सेक्सविस्फोट उसी का नतीजा है। 

एक सहयात्री ने काँटा लगा सरीखे एलबम की सफलता का सूत्र बड़े सटीक शब्दों में बयाँ किया है "आज सफल वह होता है जो या तो मौलिक रूप से उत्तम हो या फिर वह जो वर्जना तोड़ सकें। चूँकि मौलिकता कम ही मिलती है इसलिये सब के सब स्थापित वर्जनायें तोड़ने का शार्टकट अपना रहे हैं। लगता है जिस &lt;a href="http://www.oshoworld.com" rel="nofollow"&gt;दर्शन&lt;/a&gt; की ओर से हम सबने आँखे मूँद रखी है, कान ढाँप लिये हैं और मुँह सिल लिया है गाँधी के तीन आज्ञाकारी बँदरों की तरह , उसे आँखे खोल कर पढ़ना समझना जरूरी है। 

आपके लेख इतने जोरदार होते हैं कि टिप्पणीयाँ भी लेख बन जाती हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>देबू भाई</p>
<p>एक व्यक्ति एक बार एक महात्मा के पीछे पड़ गया कि मुझे ब्रह्मज्ञान का मँत्र दे दो। महात्मा ने पिँड छुड़ाने को एक कागज पर कुछ अगड़म बगड़म लिख के दे दिया और कहा कि जाओ, इसका जाप पाँच दिन तक नहाने के बाद पाँच बार करो। पर ध्यान रहे कि मँत्र जाप के समय बँदर का ध्यान न आये। आदमी बोल, यह तो बहुत आसान है और बँदर का ध्यान भला क्यो आने लगा, अब तो मैं पाँच दिन में ब्रह्मज्ञानी बन जाऊँगा। पर बेचारा जब से घर पहुँचा बँदर का ख्याल पीछा न छोड़े, बीबी तक बँदरिया दिखे, शीशे में खुद को देखे तो बँदर दिखे। लड़का पूछे कि क्या बड़बड़ा रहे हो तो उसे भी धुत्कारे कि हट बँदर कहीं का। हाल यह कि तीसरे दिन ही वापस भागा महात्मा के पास कि यह क्या दे दिया अब तो हर तरफ बँदर ही नजर आते हैं। दरअसल बँदर कही नही उसके दिल में ही था। </p>
<p>यही हाल भारतीय समाज का है, बरसों से सेक्स को हौव्वा समझ कर अलमारी में बँद करकर रखा है। उसकी शिक्षा कभी नही दी गई। जो कुछ जाना गया वह मस्तराम की सस्ती अधकचरी जानकारी से मिला। उसी का नतीजा है कि आज <a href="http://myrajasthan.blogspot.com/2006/05/harmful-oldman.html" rel="nofollow">बुढ्ढे</a>  भी त्रस्त है  और <a href="http://www.jitu.info/merapanna/?p=419" rel="nofollow">जवान</a> भी । इस बारे में  <a href="http://www.kalpana.it/hindi/blog/2006/05/blog-post_114744806571763397.html" rel="nofollow">ज्ञानपरक</a>  जानकारी और च्रचा के अभाव ने इसे अब तक हौव्वा बना कर रखा है पर जिस तरह बच्चा जिस काम को मना करो उसी को कौतूहूलवश करना चाहता है कुछ वही सब भारतीय जनमानस के साथ भी हुआ। यह सेक्सविस्फोट उसी का नतीजा है। </p>
<p>एक सहयात्री ने काँटा लगा सरीखे एलबम की सफलता का सूत्र बड़े सटीक शब्दों में बयाँ किया है &#8220;आज सफल वह होता है जो या तो मौलिक रूप से उत्तम हो या फिर वह जो वर्जना तोड़ सकें। चूँकि मौलिकता कम ही मिलती है इसलिये सब के सब स्थापित वर्जनायें तोड़ने का शार्टकट अपना रहे हैं। लगता है जिस <a href="http://www.oshoworld.com" rel="nofollow">दर्शन</a> की ओर से हम सबने आँखे मूँद रखी है, कान ढाँप लिये हैं और मुँह सिल लिया है गाँधी के तीन आज्ञाकारी बँदरों की तरह , उसे आँखे खोल कर पढ़ना समझना जरूरी है। </p>
<p>आपके लेख इतने जोरदार होते हैं कि टिप्पणीयाँ भी लेख बन जाती हैं।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: anunad</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/127#comment-184</link>
		<dc:creator>anunad</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 15 May 2006 12:16:15 +0000</pubDate>
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		<description>ये अखबार वाले भी क्या लोग हैं ? हर चीज को मजाक समझते हैं &#124;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ये अखबार वाले भी क्या लोग हैं ? हर चीज को मजाक समझते हैं |</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: दीपक</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/127#comment-181</link>
		<dc:creator>दीपक</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 15 May 2006 10:18:03 +0000</pubDate>
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		<description>पर टाइम्स ऑफ़ इन्डिया अपने सर्वेक्षण कहाँ से करता है, यह भी सोचने वाली बात है। अंग्रेज़ी का यह अखबार बाजार को देख कर खबरें छापता है। संस्कृति में आ रही विकृति से मैं भी सहमत हूँ, पर इस समाचार पत्र का उद्देश्य क्या है, ऐसी खबरों के पीछे? इस समाचार पत्र में जरुरी खबरें पिछले पन्ने पर जगह पाती हैं और ग्लैमर और मनोरंजन से जुड़ी खबरें सामने होती हैं। मीडिया अपना उत्तरदायित्व भूल गयी है, अगर कुछ गलत है तो उसे गलत बताकर ही पेश करना चहिए, न की उत्तेजक खबरों के रूप में।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पर टाइम्स ऑफ़ इन्डिया अपने सर्वेक्षण कहाँ से करता है, यह भी सोचने वाली बात है। अंग्रेज़ी का यह अखबार बाजार को देख कर खबरें छापता है। संस्कृति में आ रही विकृति से मैं भी सहमत हूँ, पर इस समाचार पत्र का उद्देश्य क्या है, ऐसी खबरों के पीछे? इस समाचार पत्र में जरुरी खबरें पिछले पन्ने पर जगह पाती हैं और ग्लैमर और मनोरंजन से जुड़ी खबरें सामने होती हैं। मीडिया अपना उत्तरदायित्व भूल गयी है, अगर कुछ गलत है तो उसे गलत बताकर ही पेश करना चहिए, न की उत्तेजक खबरों के रूप में।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Mukund</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/127#comment-180</link>
		<dc:creator>Mukund</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 15 May 2006 09:41:21 +0000</pubDate>
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		<description>टाईम्स का लेख पड कर बुरा लगा। जहाँ इन अखबारों को लड़कों को सुधारना चाहिये वहाँ ये लोग लड़कियों को भी बिगाड़ रहे हैं :(</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>टाईम्स का लेख पड कर बुरा लगा। जहाँ इन अखबारों को लड़कों को सुधारना चाहिये वहाँ ये लोग लड़कियों को भी बिगाड़ रहे हैं <img src='http://nuktachini.debashish.com/wp-includes/images/smilies/icon_sad.gif' alt=':(' class='wp-smiley' /></p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Hindi Blogger</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/127#comment-179</link>
		<dc:creator>Hindi Blogger</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 15 May 2006 09:29:25 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://nuktachini.debashish.com/127#comment-179</guid>
		<description>'जस्ट वाना हैव फ़न' की संस्कृति लंपट युवाओं (विशेषकर उच्च आय वर्ग और पब्लिक स्कूली पृष्ठभूमि वाले) में वर्षों से रही है. नई बात तो इस लंपटता में मध्यमवर्गीय युवाओं की बढ़ी-चढ़ी भागीदारी है. 

जहाँ तक पश्चिमी देशों से तुलना की बात है तो लीजिए मेरा ही एक अनुभव- एक पिछड़े भारतीय राज्य की राजधानी में एक सलीकेदार दिखने वाले सैलून में घुस गया, दाढ़ी बनवाने के लिए. दाढ़ी तो एक लड़के ने बनाया, लेकिन बाद में आफ़्टरशेव लोशन, चेहरे की मालिश वगैरह करने एक युवती को लगा दिया गया. वो मेरे चेहरे पर हाथ चलाते हुए फुसफुसा कर आमंत्रित कर रही थी...या यों कहें की गुहार लगा रही थी, कि ऊपर चलिए कुछ देर के लिए पूरे बदन की 'फ़ुल मसाज' कर दूँगी. बता नहीं सकता कि उससे पिंड छुड़ाने के लिए मुझे कितनी गुहार लगानी पड़ी. 

कई यूरोपीय शहरों में घूमा हूँ, हजामत भी बनवाई है, लेकिन वैसी परिस्थिति से कभी नहीं गुजरना पड़ा. पश्चिमी देशों के बीच आमतौर पर हर तरह की चीज़ों और गतिविधियों के बीच एक स्पष्ट विभाजक लकीर होती है. भारत में वो लकीर या तो रहती ही नहीं, और यदि रहती है तो न दिखने लायक अस्पष्टता लिए हुए. 

पश्चिम की नकल में उतनी बुराई नहीं. बुराई फूहड़ और विकृत नकल में है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8216;जस्ट वाना हैव फ़न&#8217; की संस्कृति लंपट युवाओं (विशेषकर उच्च आय वर्ग और पब्लिक स्कूली पृष्ठभूमि वाले) में वर्षों से रही है. नई बात तो इस लंपटता में मध्यमवर्गीय युवाओं की बढ़ी-चढ़ी भागीदारी है. </p>
<p>जहाँ तक पश्चिमी देशों से तुलना की बात है तो लीजिए मेरा ही एक अनुभव- एक पिछड़े भारतीय राज्य की राजधानी में एक सलीकेदार दिखने वाले सैलून में घुस गया, दाढ़ी बनवाने के लिए. दाढ़ी तो एक लड़के ने बनाया, लेकिन बाद में आफ़्टरशेव लोशन, चेहरे की मालिश वगैरह करने एक युवती को लगा दिया गया. वो मेरे चेहरे पर हाथ चलाते हुए फुसफुसा कर आमंत्रित कर रही थी&#8230;या यों कहें की गुहार लगा रही थी, कि ऊपर चलिए कुछ देर के लिए पूरे बदन की &#8216;फ़ुल मसाज&#8217; कर दूँगी. बता नहीं सकता कि उससे पिंड छुड़ाने के लिए मुझे कितनी गुहार लगानी पड़ी. </p>
<p>कई यूरोपीय शहरों में घूमा हूँ, हजामत भी बनवाई है, लेकिन वैसी परिस्थिति से कभी नहीं गुजरना पड़ा. पश्चिमी देशों के बीच आमतौर पर हर तरह की चीज़ों और गतिविधियों के बीच एक स्पष्ट विभाजक लकीर होती है. भारत में वो लकीर या तो रहती ही नहीं, और यदि रहती है तो न दिखने लायक अस्पष्टता लिए हुए. </p>
<p>पश्चिम की नकल में उतनी बुराई नहीं. बुराई फूहड़ और विकृत नकल में है.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: ratna</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/127#comment-178</link>
		<dc:creator>ratna</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 15 May 2006 07:43:56 +0000</pubDate>
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		<description>पूर्वी और पश्चिमी मुल्यों के पाटों में पिसती पीढ़ी का सटीक चित्रण। ऩारी होने के बावजूद मैं मानती हूँ कि---अबला से सबला भई, सबला से बनी बला ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पूर्वी और पश्चिमी मुल्यों के पाटों में पिसती पीढ़ी का सटीक चित्रण। ऩारी होने के बावजूद मैं मानती हूँ कि&#8212;अबला से सबला भई, सबला से बनी बला ।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अनूप शुक्ला</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/127#comment-177</link>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 15 May 2006 07:27:55 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://nuktachini.debashish.com/127#comment-177</guid>
		<description>बहुत बढ़िया लेख लिखा ।बहुत दिन बाद!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत बढ़िया लेख लिखा ।बहुत दिन बाद!</p>
]]></content:encoded>
	</item>
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