<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	>
<channel>
	<title>Comments on: एग्रीगेटरों के बहाने से</title>
	<atom:link href="http://nuktachini.debashish.com/243/feed" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://nuktachini.debashish.com/243</link>
	<description>निंदक नीयर राखिये</description>
	<pubDate>Mon, 12 May 2008 08:12:09 +0000</pubDate>
	<generator>http://wordpress.org/?v=2.5</generator>
		<item>
		<title>By: kunnu singh</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/243#comment-7389</link>
		<dc:creator>kunnu singh</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 16 Feb 2008 07:55:31 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://nuktachini.debashish.com/243#comment-7389</guid>
		<description>इतनी लम्बि पोस पोस्टिंग लीखने मे तो बहुत दिन लगा होगा</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>इतनी लम्बि पोस पोस्टिंग लीखने मे तो बहुत दिन लगा होगा</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Debashish</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/243#comment-6790</link>
		<dc:creator>Debashish</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Jul 2007 18:25:57 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://nuktachini.debashish.com/243#comment-6790</guid>
		<description>&lt;blockquote&gt;अप्रैल मे हमने भी अपने जनसत्ता वाले लेख मे कहा था कि नए फ़ीड एग्रीगेटर सामने आएन्गे और बाज़ार व मीडिया की इस पर नज़र पडेगी। सो ऐसा कुछ नही हुआ जिसका पूर्वानुमान न लगाया गया हो।&lt;/blockquote&gt;&lt;b&gt;सुजाता&lt;/b&gt;: लंबा लेख था तो मैं मान सकता है कि आपने पूरा पढ़ा नहीं। आपने आने वाले समय का अनुमान लगाया था पर मैंने आपको ये बताया कि वर्तमान और भूत में भी एग्रीगेटर रहे हैं, जिसकी &lt;a href="http://www.akshargram.com/sarvagya/index.php/Hindi_Blog_Aggregators" rel="nofollow"&gt;सर्वज्ञ पर सूची&lt;/a&gt; की कड़ी भी दी, जिनके बारे में आप जैसे लोगों, जो अखबारों में चिट्ठाकारी के बारे में ज्यादा लिखते हैं, को पता ही नहीं :) हो हल्ला केवल नारद के नाम पर ही हुआ पर विकल्प के दरवाज़े तब भी खुले थे जब चिट्ठाजगत और ब्लॉगवाणी नहीं आये थे। मंतव्य ये कि नारद की कोई मोनोपली नहीं थी।

&lt;b&gt;ज्ञानदत्त जीः&lt;/b&gt; बहुत बुरा लगा कि आपने इस "ऐतिहासिक" पोस्ट को पढ़ने का मौका हाथ आकर भी गंवा दिया ;) बहरहाल एक पंक्ति में इसका सार होना चाहिये Much Ado about an aggregator :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>अप्रैल मे हमने भी अपने जनसत्ता वाले लेख मे कहा था कि नए फ़ीड एग्रीगेटर सामने आएन्गे और बाज़ार व मीडिया की इस पर नज़र पडेगी। सो ऐसा कुछ नही हुआ जिसका पूर्वानुमान न लगाया गया हो।</p></blockquote>
<p><b>सुजाता</b>: लंबा लेख था तो मैं मान सकता है कि आपने पूरा पढ़ा नहीं। आपने आने वाले समय का अनुमान लगाया था पर मैंने आपको ये बताया कि वर्तमान और भूत में भी एग्रीगेटर रहे हैं, जिसकी <a href="http://www.akshargram.com/sarvagya/index.php/Hindi_Blog_Aggregators" rel="nofollow">सर्वज्ञ पर सूची</a> की कड़ी भी दी, जिनके बारे में आप जैसे लोगों, जो अखबारों में चिट्ठाकारी के बारे में ज्यादा लिखते हैं, को पता ही नहीं <img src='http://nuktachini.debashish.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> हो हल्ला केवल नारद के नाम पर ही हुआ पर विकल्प के दरवाज़े तब भी खुले थे जब चिट्ठाजगत और ब्लॉगवाणी नहीं आये थे। मंतव्य ये कि नारद की कोई मोनोपली नहीं थी।</p>
<p><b>ज्ञानदत्त जीः</b> बहुत बुरा लगा कि आपने इस &#8220;ऐतिहासिक&#8221; पोस्ट को पढ़ने का मौका हाथ आकर भी गंवा दिया <img src='http://nuktachini.debashish.com/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' /> बहरहाल एक पंक्ति में इसका सार होना चाहिये Much Ado about an aggregator <img src='http://nuktachini.debashish.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /></p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: ज्ञानदत पाण्डेय</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/243#comment-6784</link>
		<dc:creator>ज्ञानदत पाण्डेय</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Jul 2007 06:20:52 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://nuktachini.debashish.com/243#comment-6784</guid>
		<description>इतना लम्बा लिखते हैं और उसपर पाण्डित्य पूर्ण टिप्पणियां. सरल सा बुलेट पॉइण्ट  देता कुछ नहीं लिखा जा सकता.
कोई यह बतायेगा कि उक्त परिचर्चा का सार क्या है?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>इतना लम्बा लिखते हैं और उसपर पाण्डित्य पूर्ण टिप्पणियां. सरल सा बुलेट पॉइण्ट  देता कुछ नहीं लिखा जा सकता.<br />
कोई यह बतायेगा कि उक्त परिचर्चा का सार क्या है?</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: सुजाता</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/243#comment-6782</link>
		<dc:creator>सुजाता</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Jul 2007 04:18:46 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://nuktachini.debashish.com/243#comment-6782</guid>
		<description>एक सधा हुआ लेख। सन्तुलन के साथ अपना पक्ष रखा है। यह तो अप्रैल मे हमने भी अपने जनसत्ता वाले लेख मे कहा था कि नए फ़ीड एग्रीगेटर सामने आएन्गे और बाज़ार व मीडिया की इस पर नज़र पडेगी। सो ऐसा कुछ नही हुआ जिसका पूर्वानुमान न लगाया गया हो। चिट्ठाकारी का एक युग व्यतीत हो गया है। अभी बहुत कुछ घटित होना बाकी है। अन्तर्जाल जितना तेज़ है उतनी ही तेज़ गति से यहा दुनिया बदल जाती है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>एक सधा हुआ लेख। सन्तुलन के साथ अपना पक्ष रखा है। यह तो अप्रैल मे हमने भी अपने जनसत्ता वाले लेख मे कहा था कि नए फ़ीड एग्रीगेटर सामने आएन्गे और बाज़ार व मीडिया की इस पर नज़र पडेगी। सो ऐसा कुछ नही हुआ जिसका पूर्वानुमान न लगाया गया हो। चिट्ठाकारी का एक युग व्यतीत हो गया है। अभी बहुत कुछ घटित होना बाकी है। अन्तर्जाल जितना तेज़ है उतनी ही तेज़ गति से यहा दुनिया बदल जाती है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: masijeevi</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/243#comment-6775</link>
		<dc:creator>masijeevi</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Jul 2007 05:41:15 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://nuktachini.debashish.com/243#comment-6775</guid>
		<description>ओह..हम शायद अलग प्लेटफार्म पर कह गए...अधिकार का अर्थ आप प्रकाशनाधिकार ले रहे हैं...हमने उसे पढ़ सकने के माध्यम के रूप में कहा। मैं सहमत हूँ कि लिखे पर अधिकार (और जिम्मेदारी) लेखक/चिट्ठेकार की ही है, चाहे फीड से या अन्यथा। पर सार्वजनिक फीड को पढ़ने से रोकने का हक चिट्ठाकार को कम से कम तब तक तो नहीं ही है जब तक कि वह फीड को गैर सार्वजनिक न कर दे।

कथादेश में अविनाश ने ये बात मेरे उद्धरण से ही दी थी, &lt;a href="http://linkitmann.blogspot.com/2007/07/blog-post.html" rel="nofollow"&gt;यहॉं देखें&lt;/a&gt;.
</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ओह..हम शायद अलग प्लेटफार्म पर कह गए&#8230;अधिकार का अर्थ आप प्रकाशनाधिकार ले रहे हैं&#8230;हमने उसे पढ़ सकने के माध्यम के रूप में कहा। मैं सहमत हूँ कि लिखे पर अधिकार (और जिम्मेदारी) लेखक/चिट्ठेकार की ही है, चाहे फीड से या अन्यथा। पर सार्वजनिक फीड को पढ़ने से रोकने का हक चिट्ठाकार को कम से कम तब तक तो नहीं ही है जब तक कि वह फीड को गैर सार्वजनिक न कर दे।</p>
<p>कथादेश में अविनाश ने ये बात मेरे उद्धरण से ही दी थी, <a href="http://linkitmann.blogspot.com/2007/07/blog-post.html" rel="nofollow">यहॉं देखें</a>.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Debashish</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/243#comment-6772</link>
		<dc:creator>Debashish</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Jul 2007 03:17:33 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://nuktachini.debashish.com/243#comment-6772</guid>
		<description>&lt;blockquote&gt;“चिट्ठे की फीड चिट्ठाकार की भी बपौती नहीं है”, इस प्रकार की बात मैंने ही कही थी पर आपने उसे अधूरा उठाया जिससे वह स्‍वाभाविक रूप से ‘सरासर गलत’ हो गया- चिट्ठों की फीड यदि चिट्ठे सार्वजनिक हैं (मित्रों, परिजनों के लिए लिखे जा रहे निजी पत्र नहीं हैं) तथा उनकी फीड सार्वजनिक रूप से उपलब्‍ध है- तो ये कतई चिटृठाकार की बपौती नहीं हैं।&lt;/blockquote&gt;&lt;b&gt;मसिजीवीः&lt;/b&gt; मैंने तो अविनाश के कथादेश के लेख में कहे का ज़िक्र किया था (कड़ी अब जोड़ दी गई है), आपने भी कहा तो मुझे ज्ञात नहीं। 

आप की यहाँ कही बात से सहमत नहीं हूं। चिट्ठा अगर सार्वजनिक है (चिट्ठे को पासवर्ड प्रोटेक्ट करना संभव है) तो उसकी फीड भी सार्वजनिक होती है। बात सही है। पर जिस प्रकार चिट्ठे का प्रकाशक लेखक है वैसे ही फीड का प्रकाशक भी वही है। फीड वो खुद नहीं बनाता, ब्लॉगवेयर बना लेता है, पर मसौदा तो उसी का लिखा होता है, उस पर से उसका प्रकाशनाधिकार कैसे कम हो जाता है? जिस तरह आप किसी ब्राउज़र से सार्वजनिक साईट देख पाते हैं उसी तरह किसी भी सार्वजनिक फीड को किसी भी न्यूज़रीडर से पढ़ सकते हैं। अगर जालस्थल या फीड पर पासवर्ड प्रोटक्शन है तो दोनों को ही पढ़ने के लिये आपको अपना प्रयोक्तानाम और कूटशब्द देना होगा। 

फीड चिट्ठे का ही एक अवतार है, जैसे कि कोई पुस्तक ईबुक के रूप में भी बिक सकती है, पर दोनों पर मूल लेखक का प्रकाशनाधिकार रहता है और मसौदे का जिम्मवार वही होता है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>“चिट्ठे की फीड चिट्ठाकार की भी बपौती नहीं है”, इस प्रकार की बात मैंने ही कही थी पर आपने उसे अधूरा उठाया जिससे वह स्‍वाभाविक रूप से ‘सरासर गलत’ हो गया- चिट्ठों की फीड यदि चिट्ठे सार्वजनिक हैं (मित्रों, परिजनों के लिए लिखे जा रहे निजी पत्र नहीं हैं) तथा उनकी फीड सार्वजनिक रूप से उपलब्‍ध है- तो ये कतई चिटृठाकार की बपौती नहीं हैं।</p></blockquote>
<p><b>मसिजीवीः</b> मैंने तो अविनाश के कथादेश के लेख में कहे का ज़िक्र किया था (कड़ी अब जोड़ दी गई है), आपने भी कहा तो मुझे ज्ञात नहीं। </p>
<p>आप की यहाँ कही बात से सहमत नहीं हूं। चिट्ठा अगर सार्वजनिक है (चिट्ठे को पासवर्ड प्रोटेक्ट करना संभव है) तो उसकी फीड भी सार्वजनिक होती है। बात सही है। पर जिस प्रकार चिट्ठे का प्रकाशक लेखक है वैसे ही फीड का प्रकाशक भी वही है। फीड वो खुद नहीं बनाता, ब्लॉगवेयर बना लेता है, पर मसौदा तो उसी का लिखा होता है, उस पर से उसका प्रकाशनाधिकार कैसे कम हो जाता है? जिस तरह आप किसी ब्राउज़र से सार्वजनिक साईट देख पाते हैं उसी तरह किसी भी सार्वजनिक फीड को किसी भी न्यूज़रीडर से पढ़ सकते हैं। अगर जालस्थल या फीड पर पासवर्ड प्रोटक्शन है तो दोनों को ही पढ़ने के लिये आपको अपना प्रयोक्तानाम और कूटशब्द देना होगा। </p>
<p>फीड चिट्ठे का ही एक अवतार है, जैसे कि कोई पुस्तक ईबुक के रूप में भी बिक सकती है, पर दोनों पर मूल लेखक का प्रकाशनाधिकार रहता है और मसौदे का जिम्मवार वही होता है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Debashish</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/243#comment-6771</link>
		<dc:creator>Debashish</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Jul 2007 02:59:27 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://nuktachini.debashish.com/243#comment-6771</guid>
		<description>&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;सिरिलः&lt;/strong&gt; बस इतना ही कहूंगा कि बदला उतारने के लिये कोई भी सृजनात्मक कार्य करना संभव नहीं है. ब्लागवाणी बनाने के पीछे हमारा ध्येय जाल पर अपनी भाषा का फैलाव बढ़ाना है, और कुछ नहीं.&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;रविः&lt;/strong&gt; यह पोस्ट मोहल्ला ईजाद नहीं है. हाँ, बैक-बर्नर पर था, जो इस समय हिलोरें मार कर ऊपर आ गया&lt;/blockquote&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;सृजन शिल्पीः&lt;/strong&gt; कहीं-कहीं आपकी राय से सहमत नहीं हो पा रहा हूँ, मसलन यह कि नए एग्रीगेटरों के अस्तित्व में आने को मौके का फायदा उठाए जाने के कोशिश के रूप में देखना। जबकि आपको इन परियोजनाओं की जानकारी, मेरे ख्याल से, पहले से ही थी।&lt;/blockquote&gt;मेरे ख्याल से मेरे कटाक्ष से वस्तुस्थिति थोड़ी स्पष्ट हुई होगी। नहीं हुई तो ये है मेरा आकलन, ब्लॉगवाणी सबसे पहले कैफेहिन्दी के साथ &lt;a href="http://www.akshargram.com/2007/01/31/586/" rel="nofollow"&gt;चोर दरवाज़े से प्रविष्ट&lt;/a&gt; हुआ था और ये एग्रीगेटर तब &lt;a href="http://www.lyspick.com/" rel="nofollow"&gt;यहाँ&lt;/a&gt; हुआ करता था। ये जनवरी 2007 की बात है, तो ब्लॉगवाणी 20 दिनों में नहीं तैयार हो गया (मैं यह नहीं कह रहा कि सिरिल जैसे अनुभवी प्रोग्रामर इसको 20 दिन में नहीं बना सकते थे। अगर वे LAMP चुनते तो प्लिग और ग्रेगेरियस जैसे डिग क्लोन मुफ्त मिलते हैं।) 

और अज्ञातवास से वापस आने का अवसर क्यों और कैसे चुना गया ये छुपा नहीं है। अफ़लातूनजी ने न केवल निम्नलिखित बात लिखी बल्कि ब्लॉगवाणी के विमोचन की प्रथम घोषणा भी उन्होंने ही की। ब्लॉगवाणी का रिवाईवल दूसरों से क्या कहकर किया जा रहा था ये बताने के लिये उद्धत कर रहा हूँ&lt;blockquote&gt;‘पचखा’ में चल रहे नारद से मुक्ति के लिए एक शानदार औजार आ रहा है जुलाई १० के पहले। धुरविरोधी द्वारा कड़े प्रतिकार का रचनात्मक पहलू और अक्स हम उसी एग्रीगेटर में देखेंगे। आज मैथिलीशरण गुप्त के ‘जयद्रथ-वध’ की पंक्तियाँ याद आ रही हैं :
    दुर्वृत्त दुर्योधन न जो शठता सहित हठ ठानता,
    जो प्रेमपूर्वक पाण्डवों की मान्यता को मानता।
    तो डूबता भारत न यों रण-रक्त पारावार में,
    ले डूबता है एक पापी नाँव को मझदार में।। 
&lt;/blockquote&gt;
&lt;strong&gt;सृजनः&lt;/strong&gt; हमारी इस विषय में पहले भी बात हो चुकी है। हम उन चिट्ठाकारों में सम्मिलित थे जो एक समय व्यावसायिक चिट्ठाकारी की बात कर रहे थे। जाहिर है कि चिट्ठाकारी से कमाई करने से हमें कोई एतराज़ नहीं। कोई जालस्थल अपना भविष्य सुदृढ़ करने के लिये आर्थिक पक्ष को मद्देनज़र रख कर चले ये बुद्धिमता की बात है। कैफेहिन्दी ने अपना मंतव्य शुरु में स्पष्ट न कर, बगैर अनुमति उन्हें प्रकाशित कर हमें अपनी राय बनाने का मौका दिया। वे व्यावसायिक तौर पर सॉफ्टवेयर व पुस्तकें &lt;a href="http://www.justitbiz.com/" rel="nofollow"&gt;बेचने वाली&lt;/a&gt; &lt;a href="http://www.itbix.com/" rel="nofollow"&gt;कंपनी&lt;/a&gt; के स्वामी हैं, यह मानना मुश्किल है कि वे कॉपीराईट के सिद्धाँतों से वाकिफ नहीं थे या उनका हित हिन्दी का ही भला करना रहा हो। ब्लॉगवाणी पर जिस मुफ्त टायपिंग टूल का विज्ञापन लगा है वो फ्रीवेयर नहीं &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Adware" rel="nofollow"&gt;एडवेयर&lt;/a&gt; है क्योंकि इसमें तमाम जगह कैफेहिन्दी और आईटीबिक्स की कड़ियाँ हैं। ये कथनी और करनी का अंतर है। ये बात कहने के लिये शायद मैथिली से व्यक्तिगत रूप से मिल चुके लोग धो डालें पर जो कहना था सो कह दिया।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><strong>सिरिलः</strong> बस इतना ही कहूंगा कि बदला उतारने के लिये कोई भी सृजनात्मक कार्य करना संभव नहीं है. ब्लागवाणी बनाने के पीछे हमारा ध्येय जाल पर अपनी भाषा का फैलाव बढ़ाना है, और कुछ नहीं.</p></blockquote>
<blockquote><p><strong>रविः</strong> यह पोस्ट मोहल्ला ईजाद नहीं है. हाँ, बैक-बर्नर पर था, जो इस समय हिलोरें मार कर ऊपर आ गया</p></blockquote>
<blockquote><p><strong>सृजन शिल्पीः</strong> कहीं-कहीं आपकी राय से सहमत नहीं हो पा रहा हूँ, मसलन यह कि नए एग्रीगेटरों के अस्तित्व में आने को मौके का फायदा उठाए जाने के कोशिश के रूप में देखना। जबकि आपको इन परियोजनाओं की जानकारी, मेरे ख्याल से, पहले से ही थी।</p></blockquote>
<p>मेरे ख्याल से मेरे कटाक्ष से वस्तुस्थिति थोड़ी स्पष्ट हुई होगी। नहीं हुई तो ये है मेरा आकलन, ब्लॉगवाणी सबसे पहले कैफेहिन्दी के साथ <a href="http://www.akshargram.com/2007/01/31/586/" rel="nofollow">चोर दरवाज़े से प्रविष्ट</a> हुआ था और ये एग्रीगेटर तब <a href="http://www.lyspick.com/" rel="nofollow">यहाँ</a> हुआ करता था। ये जनवरी 2007 की बात है, तो ब्लॉगवाणी 20 दिनों में नहीं तैयार हो गया (मैं यह नहीं कह रहा कि सिरिल जैसे अनुभवी प्रोग्रामर इसको 20 दिन में नहीं बना सकते थे। अगर वे LAMP चुनते तो प्लिग और ग्रेगेरियस जैसे डिग क्लोन मुफ्त मिलते हैं।) </p>
<p>और अज्ञातवास से वापस आने का अवसर क्यों और कैसे चुना गया ये छुपा नहीं है। अफ़लातूनजी ने न केवल निम्नलिखित बात लिखी बल्कि ब्लॉगवाणी के विमोचन की प्रथम घोषणा भी उन्होंने ही की। ब्लॉगवाणी का रिवाईवल दूसरों से क्या कहकर किया जा रहा था ये बताने के लिये उद्धत कर रहा हूँ<br />
<blockquote>‘पचखा’ में चल रहे नारद से मुक्ति के लिए एक शानदार औजार आ रहा है जुलाई १० के पहले। धुरविरोधी द्वारा कड़े प्रतिकार का रचनात्मक पहलू और अक्स हम उसी एग्रीगेटर में देखेंगे। आज मैथिलीशरण गुप्त के ‘जयद्रथ-वध’ की पंक्तियाँ याद आ रही हैं :<br />
    दुर्वृत्त दुर्योधन न जो शठता सहित हठ ठानता,<br />
    जो प्रेमपूर्वक पाण्डवों की मान्यता को मानता।<br />
    तो डूबता भारत न यों रण-रक्त पारावार में,<br />
    ले डूबता है एक पापी नाँव को मझदार में।।
</p></blockquote>
<p><strong>सृजनः</strong> हमारी इस विषय में पहले भी बात हो चुकी है। हम उन चिट्ठाकारों में सम्मिलित थे जो एक समय व्यावसायिक चिट्ठाकारी की बात कर रहे थे। जाहिर है कि चिट्ठाकारी से कमाई करने से हमें कोई एतराज़ नहीं। कोई जालस्थल अपना भविष्य सुदृढ़ करने के लिये आर्थिक पक्ष को मद्देनज़र रख कर चले ये बुद्धिमता की बात है। कैफेहिन्दी ने अपना मंतव्य शुरु में स्पष्ट न कर, बगैर अनुमति उन्हें प्रकाशित कर हमें अपनी राय बनाने का मौका दिया। वे व्यावसायिक तौर पर सॉफ्टवेयर व पुस्तकें <a href="http://www.justitbiz.com/" rel="nofollow">बेचने वाली</a> <a href="http://www.itbix.com/" rel="nofollow">कंपनी</a> के स्वामी हैं, यह मानना मुश्किल है कि वे कॉपीराईट के सिद्धाँतों से वाकिफ नहीं थे या उनका हित हिन्दी का ही भला करना रहा हो। ब्लॉगवाणी पर जिस मुफ्त टायपिंग टूल का विज्ञापन लगा है वो फ्रीवेयर नहीं <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Adware" rel="nofollow">एडवेयर</a> है क्योंकि इसमें तमाम जगह कैफेहिन्दी और आईटीबिक्स की कड़ियाँ हैं। ये कथनी और करनी का अंतर है। ये बात कहने के लिये शायद मैथिली से व्यक्तिगत रूप से मिल चुके लोग धो डालें पर जो कहना था सो कह दिया।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Debashish</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/243#comment-6770</link>
		<dc:creator>Debashish</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Jul 2007 02:57:05 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://nuktachini.debashish.com/243#comment-6770</guid>
		<description>अपनी राय जताने के लिये सभी टिप्पणीकारों का शुक्रिया!

&lt;blockquote&gt;याद है ना देबाशीश जी मेरे चिट्ठे पर आपकी तिल्मिलाती प्रतिक्रिया, जो आपने हिंदुओ को गरैयाने पर कभी भी नही की :)&lt;/blockquote&gt;
&lt;strong&gt;अरूण&lt;/strong&gt;: मेरी तल्ख टिप्पणी भी याद है और खेद व्यक्त करते हुये उसे वापस लेना भी। पर आपने अपनी न पोस्ट वापस ली न ही वाहियात चित्र हटाये। यही हमारी वैचारिक सोच का अंतर है, आप पंगेबाजी करने के लिये चिट्ठाकारी में उतरे, मैं नुक्ताचीनी करने। गलतियाँ स्वीकार कर उन्हें सुधारने का प्रयास ही मानवता के अब तक टिके रहने का कारण है शायद। जिन भले लोगों की भलमनसाहत पर दुनिया टिकी है उस पर जल्द ही एक पोस्ट लिखने वाला हूं, पढ़ियेगा।

मैंने लिखा था कि मेरी सोच यही है कि ईश्वर ने इंसान को नहीं बल्कि इंसान ने ईश्वर को बनाया। हम सब हाड़माँस के बने हैं, भौगोलिक अंतरों के कारण हमारे रंग अलग हुये पर रक्त का रंग वही है। और शुक्र है कि आज भी एक मुसलमान का खून किसी घायल हिन्दू की जान बचाने के लिये चढ़ाया जा सकता है। हमें एक दूसरे से नफरत करने के हज़ार कारण मिल सकते हैं पर सचाई ये है कि दुनिया अब भी मुहब्बत पर ही चल रही है, नेताओं और धर्मगुरुओं के नफरत का ज़हर पिलाने की लाख कोशिशों के बावजूद। 

मैंने हिन्दुओं या मुसलमान को गरियाने की बात का विरोध नहीं किया, अभिव्यक्ति के लिये ही तो चिट्ठाकारी में उतरे हैं, विरोध किया इज़हार के तरीके पर, विरोध करने वाले को चुप कराने की कोशिशों पर, मुद्दों की बजाय व्यक्ति पर प्रहार करने की नीति पर। जैसा की मैंने लिखा कि सभ्य बहस और पंगेबाज़ी में काफी अंतर है। नेट पर ये अनेकों जगह चलता है, इंटरनेट आखिरकार है तो समाज का ही अक्स, पर इसकी निंदा हर जगह होती है। आपसे जब मिलुंगा तो गले मिलकर टेबल पर बैठकर "पंगे" लेंगे :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अपनी राय जताने के लिये सभी टिप्पणीकारों का शुक्रिया!</p>
<blockquote><p>याद है ना देबाशीश जी मेरे चिट्ठे पर आपकी तिल्मिलाती प्रतिक्रिया, जो आपने हिंदुओ को गरैयाने पर कभी भी नही की <img src='http://nuktachini.debashish.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p></blockquote>
<p><strong>अरूण</strong>: मेरी तल्ख टिप्पणी भी याद है और खेद व्यक्त करते हुये उसे वापस लेना भी। पर आपने अपनी न पोस्ट वापस ली न ही वाहियात चित्र हटाये। यही हमारी वैचारिक सोच का अंतर है, आप पंगेबाजी करने के लिये चिट्ठाकारी में उतरे, मैं नुक्ताचीनी करने। गलतियाँ स्वीकार कर उन्हें सुधारने का प्रयास ही मानवता के अब तक टिके रहने का कारण है शायद। जिन भले लोगों की भलमनसाहत पर दुनिया टिकी है उस पर जल्द ही एक पोस्ट लिखने वाला हूं, पढ़ियेगा।</p>
<p>मैंने लिखा था कि मेरी सोच यही है कि ईश्वर ने इंसान को नहीं बल्कि इंसान ने ईश्वर को बनाया। हम सब हाड़माँस के बने हैं, भौगोलिक अंतरों के कारण हमारे रंग अलग हुये पर रक्त का रंग वही है। और शुक्र है कि आज भी एक मुसलमान का खून किसी घायल हिन्दू की जान बचाने के लिये चढ़ाया जा सकता है। हमें एक दूसरे से नफरत करने के हज़ार कारण मिल सकते हैं पर सचाई ये है कि दुनिया अब भी मुहब्बत पर ही चल रही है, नेताओं और धर्मगुरुओं के नफरत का ज़हर पिलाने की लाख कोशिशों के बावजूद। </p>
<p>मैंने हिन्दुओं या मुसलमान को गरियाने की बात का विरोध नहीं किया, अभिव्यक्ति के लिये ही तो चिट्ठाकारी में उतरे हैं, विरोध किया इज़हार के तरीके पर, विरोध करने वाले को चुप कराने की कोशिशों पर, मुद्दों की बजाय व्यक्ति पर प्रहार करने की नीति पर। जैसा की मैंने लिखा कि सभ्य बहस और पंगेबाज़ी में काफी अंतर है। नेट पर ये अनेकों जगह चलता है, इंटरनेट आखिरकार है तो समाज का ही अक्स, पर इसकी निंदा हर जगह होती है। आपसे जब मिलुंगा तो गले मिलकर टेबल पर बैठकर &#8220;पंगे&#8221; लेंगे <img src='http://nuktachini.debashish.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /></p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Tarun</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/243#comment-6769</link>
		<dc:creator>Tarun</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Jul 2007 01:15:00 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://nuktachini.debashish.com/243#comment-6769</guid>
		<description>पिछली बार सोचा था बात खत्म हो गयी लेकिन अब लगता है कि शुरू ही हुई है, एग्रीगेटर के लिये बहुत सही कहा है खासकर नारद का ढांचा बदलने के लिये</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पिछली बार सोचा था बात खत्म हो गयी लेकिन अब लगता है कि शुरू ही हुई है, एग्रीगेटर के लिये बहुत सही कहा है खासकर नारद का ढांचा बदलने के लिये</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अनूप शुक्ल</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/243#comment-6767</link>
		<dc:creator>अनूप शुक्ल</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 11 Jul 2007 15:53:07 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://nuktachini.debashish.com/243#comment-6767</guid>
		<description>बहुत अच्छा लिखा। विस्तार से। यह सही है कि नारद की प्रक्रियायें खुली रखीं गईं, और जीतू हर किसी को व्यक्तिगत रूप से जवाब देते रहे। यह एग्रीगेटर के लिहाज से अपरिपक्वता का काम था। खासकर तब और इसका नुकसान हुआ जब एक सधी हुयी प्रवक्ता वाली भाषा का प्रयोग करने के बजाय 'अनौपचारिक सुप्रीमो' वाली भाषा का इस्तेमाल हुआ। लेकिन इस सबसे बहुत कुछ सीखने को मिला जो आगे काम आयेगा। 

एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि आमतौर पर चिट्ठों पर बैन के होने के बावजूद यह ब्लाग मेरी सहमति से बैन हुआ था।

आगे ब्लाग एग्रीगेटर में सुझाव पर अमल तकनीकी दिग्गज करेंगे। 

 बहुत दिन बाद इतना विस्तार से लिखा गया लेख पढ़ा और यह सुखद आश्चर्य का विषय था कि यह कहीं से नीरस नहीं लगा। बहुत अच्छा लगा। बधाई!:)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत अच्छा लिखा। विस्तार से। यह सही है कि नारद की प्रक्रियायें खुली रखीं गईं, और जीतू हर किसी को व्यक्तिगत रूप से जवाब देते रहे। यह एग्रीगेटर के लिहाज से अपरिपक्वता का काम था। खासकर तब और इसका नुकसान हुआ जब एक सधी हुयी प्रवक्ता वाली भाषा का प्रयोग करने के बजाय &#8216;अनौपचारिक सुप्रीमो&#8217; वाली भाषा का इस्तेमाल हुआ। लेकिन इस सबसे बहुत कुछ सीखने को मिला जो आगे काम आयेगा। </p>
<p>एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि आमतौर पर चिट्ठों पर बैन के होने के बावजूद यह ब्लाग मेरी सहमति से बैन हुआ था।</p>
<p>आगे ब्लाग एग्रीगेटर में सुझाव पर अमल तकनीकी दिग्गज करेंगे। </p>
<p> बहुत दिन बाद इतना विस्तार से लिखा गया लेख पढ़ा और यह सुखद आश्चर्य का विषय था कि यह कहीं से नीरस नहीं लगा। बहुत अच्छा लगा। बधाई!:)</p>
]]></content:encoded>
	</item>
</channel>
</rss>
