नुक्ताचीनी ~ Hindi Blog


खास चिट्ठाकारी में आम ट्रॉलिंग

By • Jul 22nd, 2007 • Category: हम बोलेंगे तो...

मुझे मालूम है कि ये ट्रॉलिंग है पर चुंकि ये करने वाले रजनीश मंगला हैं, जो पुराने ब्लॉगर है और शायद इंटरनेटिय हाईबरनेशन पर थे, इसीलिये ये जवाबी पोस्ट लिख रहा हूं। ट्रॉलिंग इसी लिये कह रहा हूं क्योंकि इन्होंने सर्वज्ञ के एक पृष्ठ का हवाला देकर लिखा पर उसको विकी के डिस्कशन पृष्ठ पर न लिख कर अपने ब्लॉग पर लिखना उचित समझा और दूसरा की मुझ पर व्यक्तिगत प्रहार किया। हिन्दी चिट्ठाकारी में लोगों को तेवर दिखाने का ये नया रोग लगा है, एक साहब किसी को गोली मारने की धमकी दे रहे हैं तो रजनीश मेरे सर पर लाठी ही मारने के लिये आमादा हैं। खु्न्नस की भी हद होती है।

निरंतर शुरु हुये 2 साल हो गये हैं और रजनीश को अचानक इस बात पर गुस्सा आ रहा है कि इसको विश्व की पहली हिन्दी ब्लॉगज़ीन कहा जा रहा है। ये है उनकी पोस्ट:

हिन्दी चिट्ठाकारी का अभी सारा concept ही नया है। इसमें अभी अधिकतर वो लोग ही जुड़े हुए हैं जो किसी न किसी क्षेत्र में माहिर हैं। उन सभी लोगों ने हिन्दी चिट्ठाकारी को कुछ न कुछ नया दिया है, कोई न कोई काम ऐसा किया है जो पहले नहीं हुआ। किसी ने कोई टूलबार पहले बनाई, किसी ने किसी नए विषय पर पहला चिट्ठा बनाया, किसी ने कोई उपयोगी टूल पहली बार बनाया, किसी ने हिन्दी में पहली बार कोई लोगो बनाया आदि। आम बंदे के बस की बात तो अभी चिट्ठाकारी है नहीं। ऐसे में कैसे लोग बार बार लगातार ढिंढोरा पीट सकते हैं कि फ़लां ने पहली बार चिट्ठा बनाया अथवा विश्व की पहली हिन्दी ब्लॉगज़ीन बनाई? (यहाँ देखें)

मुझे बात ही समझ नहीं आई, हिन्दी चिट्ठाकारी क्या चिट्ठाकारी ही आम नहीं है ये तो हम सभी जानते हैं। अगर आप इतर दुनिया में थे तो हिन्दी चिट्ठाकारी को शुरु हुये चार साल हो गये हैं, आप क्या इंसान की उम्र के साथ इसकी तुलना कर रहे हैं? हिन्दी चिट्ठाकारी अब भी नया कंसेप्ट है? रही बात ढिंढोरा पीटने की तो आप भी पीटो, सर्वज्ञ के पृष्ठ पर, अन्य हर जगह, किसने रोका है? निरंतर विश्व की पहली ब्लॉगज़ीन है, ये बात 100 फीसदी सच है, और अपनी USP के तौर पर हमने इस तथ्य को हाईलाईट किया, हर जालस्थल करता है, भले अतिश्योक्तिपूर्ण लगे।

अगर सभी चिट्ठाकार ऐसे अपने अपने कामों का दावा करने लगें तो हिन्दी चिट्ठाकारी अहंकार से भरे हुए लोगों का मैदान बनकर रह जाएगा। वैसे भी क्या ‘ब्लॉगज़ीन’ कोई साहित्यिक शब्द है? अगर सड़क चलते आदमी से पूछो कि क्या तुमने विश्व की पहली हिन्दी ब्लॉगज़ीन देखी है तो शायद वो आपके सर पर लाठी मार दे। ‘पहले प्रधानमंत्री’ आदि की बात तो समझ में आती है, लेकिन ये ब्लॉगज़ीन का क्या मतलब है? बिना सोचे समझे, तर्क वितर्क किए जो लोग इस तरह की चीज़ों के पिछलग्गू बने रहते हैं, उन्हें ज़रा इसके बारे में सोचना चाहिए।

सड़क चलते अदमी से पूछेंगे ब्लॉगिंग क्या है, अभिव्यक्ति या हिन्दी विकीपीडिया क्या है, तो वो बता देगा? क्या हास्यास्पद बात है! ब्लॉगज़ीन साहित्यिक शब्द हैं यह हमने कब कहा? ये अंग्रेज़ी पोर्टमैंट्यू शब्द है, जिसका हिन्दी तजुर्मा होता है चिट्ठा पत्रिका। क्या गलत हैं इसमें? इसमें क्या सोचना समझना है और? जो चीज़ पहली बार हुई हो उसको क्या दूसरी कहेंगे?

रजनीश आपने निराश किया है ये मुद्दा उठा कर, आप किस बात से खिन्न हैं? मुझे नहीं पता कि इस बात का आपके अपकमिंग जर्मनी पर हिन्दी जालस्थल के निर्माण से कुछ लेना देना है या फिर इस बात से कि एक समय आप हिन्दी चिट्ठों के पीडीएफ बना कर न जाने उन का क्या कर रहे थे। मुझे याद है कि आपने उस समय मुझसे बिना पूछे निरंतर का एक लेख उसमें शामिल किया और फिर मुझे सूचना भर दे दी। जब मैंने आपत्ति की, क्योंकि उस समय मैं निरंतर के बारे में व्यावसायिक तौर पर अनिश्चित था, तो आपने कहा कि ये प्रति तो जा चुकी है आगे से ऐसा नहीं होगा। मुझे नहीं पता कि वो खीज अब जाकर निकली। आपकी सूचना के लिये बता दूं कि निरंतर अब क्रियेटिव कॉमन लाईसेंस के तहत जारी होती है, यानि कोई भी इसकी सामग्री का गैर व्यवसायिक प्रयोग कर सकता है, बशर्ते उस में बदलाव न किये जायें और attribution यानि निरंतर के लेख की कड़ी और ज़िक्र हो।

बेहद टुच्चा विषय उठाया रजनीश और दुख होता है कि निरंतर के बारे में जो मुझे बेहद प्रिय है। और आपको ये भी बता दूं कि पॉडभारती हिन्दी की पहली पॉडज़ीन है। ये भी सच है। और कुढ़ने के लिये ये जानकारी काफी होगी।

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12 टिप्पणीयाँ »

  1. अरे देबाशीश तुम्हे जितू को सिवाय अपनी प्रशंशा के भाता भी क्या है ,मै तो पहले ही कह चुका हू ,निंदक नियरै राखिये का बोर्ड लगाने से काम नही चलता ,तुम्हे तो सिर्फ़ दुसरे की नुकता चीनी की आदत है ,स्वंय की नही भाइ अब बोर्ड पर भी लिख कर लगा दो लोगो को तभी समझ मे आयेगा.समझे ..?
    और एक और चिट्ठा शुरु करदो दोनो मिल कर हम महान है,भाइ आखिर एक इसी काम मे तो दोनो आदमी आत्म निर्भर हो…?

  2. सई है भैया! बधाई तुम्हें एक और पंगेबाज साथी मिल गया है। और जीतू के बाद अब क्या मेरी बारी है? और मेरे बाद किसके पीछे लगोगे? बाज़ आ जाओ, हर किसी के सब्र की हद होती है, तुम शिशुपाल नहीं कि सौ गुनाह माफ कर दिये जायेंगे।

  3. खैर आपकी पत्रिका सबसे पहली है इस में तो कोई शक हो ही नहीं सकता। पर मुझे वो चिट्ठा पत्रिका के बजाए अंतरजालीय पत्रिका यानि वेबजीन ज्यादा लगती है , क्यूँ लगती है इसके बारे में पहले कह चुका हूँ और आज जब निरंतर की बात चली है तो पुनः व्यक्त कर रहा हूँ

    “ब्लॉगजीन कहलाने वाली ये पत्रिकाएँ मुझे वेबजीन ज्यादा और ब्लॉगजीन कम लगती हैं। वेबजीनों की तरह यहाँ भी संपादक मंडल एक्सक्लयूसिव रचनाओं की मांग करते हैं और फिर चिट्ठाकारों की लिखी इन रचनाओं को चिट्ठाकारों से पढ़ने की गुजारिश करते हैं। मेरी समझ से एक अच्छी ब्लॉगजीन वो है जो चिट्ठे में लिखी जाने वाली अच्छी रचनाओं को छांटे और उसे उस पाठक वर्ग तक पहुँचाए जो अच्छा हिंदी लेखन पढ़ने के लिए इच्छुक है पर जिसके पास रोज सारे चिट्ठों को पढ़ने का समय नहीं है। चिट्ठे में लिखे जाने वाली सामग्री और पत्रिकाओं में छपने वाली रचनाओं मे यही तो अंतर है कि ये अनगढ़ होती हैं, इसे लिखते वक्त लेखक के सामने संपादक की इच्छाओं की तलवार नहीं लटका करती । इसीलिए इनमें ताजगी का वो पुट होता है जो कई बार सावधानी से गढ़ी हुई रचनाओं में नदारद होता है। और यही तो एक चिट्ठे के स्वाभाविक रूप को उजागर करती हैं जो किसी भी ब्लॉगजीन कहलाने वाली पत्रिका का पहला उद्देश्य होना चाहिए। आशा है इतनी मेहनत से पत्रिका चलाने वाले लोग इस बात पर ध्यान देंगे।”

  4. शुक्र है उन्होने तरकश को बख्श दिया. हम कृतार्थ हुए. 😉

  5. रजनीश तो पहले भी अपने तेवर चिट्ठाकार पर दिखाते रहे हैं. आश्चर्य है कि निरंतर पर उनकी नींद दो साल बाद खुली. मगर मुझे लगता है कि आपने भी इसे तरजीह देकर ठीक नहीं किया. रजनीश का वह पोस्ट खुद ही अपनी मौत मर जाता. आपके इस पोस्ट के कारण मुझे भी ये नई रजनीशी बात पता चली!

  6. इन दिनो आपसी सहयोग व बन्धूत्त्व की बात हो रही है और रजनीश भाई की तरफ से जो लिखा गया आश्चर्य जगाने वाला था. थोड़ा विचित्र लगा क्यों की पहली ब्लोगजीन होने का दावा आज का नहीं है.

  7. “बाज़ आ जाओ, हर किसी के सब्र की हद होती है, तुम शिशुपाल नहीं कि सौ गुनाह माफ कर दिये जायेंगे।”

    देबाशीशजी, शायद पहली बार आपके चिट्ठे पर टिप्पणी लिख रहा हूँ, लेकिन इस प्रकार के शब्दों के प्रयोग करने का क्या अर्थ हो सकता है । ऐसी टिप्पणियाँ लिखकर आप फ़िजूल में मुद्दे को हवा दे रहे हैं ।

    क्या हिन्दी चिट्ठाजगत में सच में आपसी संवाद की ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है कि अगर आप मेरे साथ नहीं हैं तो आप मेरे विरोधी हैं । आप वरिष्ठ चिट्ठाकार हैं और आशा करता हूँ मेरी टिप्पणी को सकारात्मक रूप में लेंगे ।

    साभार,

  8. इग्नोर माने पता है?

  9. सभी लोग सारहीन बातों की अनदेखी करें, इसी में हिन्दी चिट्ठाजगत की भलाई है।
    मेरे खयाल से रजनीश का पोस्ट भी अनावश्यक था और आप का स्पष्टीकरण भी।

  10. भई, आजकल तो ट्रैन्ड है,
    किसी स्थापित व्यक्ति/संस्था को गाली दो, हिट्स मिलेंगे। कुछ तो असंतुष्ट होंगे ही ग्रुप मे, वो अपनी भड़ास निकालेंगे और आपके पीछे हो लेंगे। जिसको गाली दी, वो भी कम से कम चार लोगों को जरुर ही पढाएगा और फिर अपना पक्ष रखेगा। सीधा सीधा गेम प्लान है, हिट्स पाने का। लेकिन मेरे विचार से लानत है इस गन्दे खेल पर। ब्लॉग होता है अभिव्यक्ति के लिए, ना कि हिट्स के लिए। आप अपने लिए लिखे, अच्छा लिखे, रचनात्मक लिखे।

    देबू भाई, कोई भी १००% संतुष्ट नही होता इस जगत में, ऐसे लोगों को इग्नोर करें। मौज मे रहे और अपना अच्छा लेखन चालू रखें।

  11. मगर मुझे लगता है कि आपने भी इसे तरजीह देकर ठीक नहीं किया. रजनीश का वह पोस्ट खुद ही अपनी मौत मर जाता.

    रवि भैया हो सकता है मैंने गलती की। पर मैंने जवाब इसीलिये दिया क्योंकि रजनीश पुराने चिट्ठाकार रहे हैं, उनको इग्नोर नहीं कर सकता। अभी अपने चिट्ठे पर उनका कहना है कि “क्या ब्लॉगज़ीन शब्द के कहीं मायने बताये गये हैं”, सवाल ये है कि क्या उन्होंने मायने खोजने की कोशिश की? ज्यादा दूर नहीं निरंतर के अबाउट पृष्ठ तक जाना होता। इसी लिये मैंने इसे ट्रॉलिंग कहा क्योंकि ध्यानार्कषित करने के लिये उन्होंने बस कीचड़ उछाल दिया, न कोई तफ्तीश की, ना कुछ सोचा। चुंकि ब्लॉगज़ीन शब्द का अर्थ वे नहीं जानते, या उन्हें अटपटा लगा और सर्वज्ञ पर विवरण से खीज हुई, तो क्षोभ हम पर निकाल दिया। क्या इस पर सब्र धरे बैठा रहना उचित था? मेरा पक्ष फिर कौन, कहाँ रखता?

    अनुराग, अनुनादः मेरे ख्याल से ये मैं अक्सर करता रहा हूँ, संभव है कि मेरे सब्र की सीमा आप लोगों से, जीतू से कम हो। हो सकता है चुप रहने से पोस्ट “अपनी मौत मर जाता” पर हो सकता है कि ये कई पाठकों के मन में संशय भी छोड़ जाता। मामले का दूसरा पक्ष रख कर मैंने पलड़ा बराबर कर दिया। अब दोनों की राय के आधार पर जो राय बनायेगा मुझे मंजूर होगा।

    नीरज: कल्पना करें कि अरुण की ये टिप्पणीयाँ आप के ब्लॉग पर की जा रही हों। मुझे टिप्पणियाँ हटाना अच्छा नहीं लगता और मुंहतोड़ जवाब देने में मुझे कोई बुराई नज़र नहीं आती। अगले को भी पता चल जाता है वो मनमानी नहीं कर सकता।

  12. मनीष: आपकी ये पोस्ट मुझ से छूट गई थी। ब्लॉगज़ीन एक वेबज़ीन भी है ये बिल्कुल सही बात है। ब्लॉगज़ीन शब्द की व्याख्या आपने क्या की मुझे नहीं मालूम, जैसा मैंने अपनी पोस्ट में कहा ये ब्लॉग और मैगेज़ीन का मिलाजुला शब्द है और ये इसीलिये रखा गया क्योंकि पत्रिका में ब्लॉग और पत्रिका के मिले जुले गुण हैं। आम पत्रिका/वेबज़ीन में आप लेख के साथ टिप्पणी नहीं लिखते, न ही टिप्पणी वहाँ दिखती है। निरंतर पर लेख ब्लॉग पोस्ट की ही शक्ल में होते हैं। पत्रिका इसलिये क्योंकि ये ब्लॉग की तरह लगातार अपडेट नहीं होती, क्रोनोलाजी का पोस्टवार महत्व नहीं है और क्योंकि, दरअसल ये एक पत्रिका ही है। आपने कहा की निरंतर ब्लॉगज़ीन कम लगती है, तो कृपया मुझे बतायें कि ब्लॉगज़ीन से आप क्या समझते हैं? मुझे नहीं लगता कि निरंतर के पहले हिन्दी लेखन समुदाय में इस शब्द को कभी सुना कहा गया होगा।