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	<title>Comments on: खास चिट्ठाकारी में आम ट्रॉलिंग</title>
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	<description>निंदक नीयर राखिये</description>
	<pubDate>Wed, 03 Dec 2008 22:10:05 +0000</pubDate>
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		<title>By: Debashish</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/251#comment-6830</link>
		<dc:creator>Debashish</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 22 Jul 2007 15:59:54 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;b&gt;मनीष:&lt;/b&gt; आपकी ये पोस्ट मुझ से छूट गई थी। ब्लॉगज़ीन एक वेबज़ीन भी है ये बिल्कुल सही बात है। ब्लॉगज़ीन शब्द की व्याख्या आपने क्या की मुझे नहीं मालूम, जैसा मैंने अपनी पोस्ट में कहा ये ब्लॉग और मैगेज़ीन का &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Portmanteau" rel="nofollow"&gt;मिलाजुला शब्द&lt;/a&gt; है और ये इसीलिये रखा गया क्योंकि पत्रिका में ब्लॉग और पत्रिका के मिले जुले गुण हैं। आम पत्रिका/वेबज़ीन में आप लेख के साथ टिप्पणी नहीं लिखते, न ही टिप्पणी वहाँ दिखती है। निरंतर पर लेख ब्लॉग पोस्ट की ही शक्ल में होते हैं। पत्रिका इसलिये क्योंकि ये ब्लॉग की तरह लगातार अपडेट नहीं होती, क्रोनोलाजी का पोस्टवार महत्व नहीं है और क्योंकि, दरअसल ये एक पत्रिका ही है। आपने कहा की निरंतर ब्लॉगज़ीन कम लगती है, तो कृपया मुझे बतायें कि ब्लॉगज़ीन से आप क्या समझते हैं? मुझे नहीं लगता कि निरंतर के पहले हिन्दी लेखन समुदाय में इस शब्द को कभी सुना कहा गया होगा।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p><b>मनीष:</b> आपकी ये पोस्ट मुझ से छूट गई थी। ब्लॉगज़ीन एक वेबज़ीन भी है ये बिल्कुल सही बात है। ब्लॉगज़ीन शब्द की व्याख्या आपने क्या की मुझे नहीं मालूम, जैसा मैंने अपनी पोस्ट में कहा ये ब्लॉग और मैगेज़ीन का <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Portmanteau" rel="nofollow">मिलाजुला शब्द</a> है और ये इसीलिये रखा गया क्योंकि पत्रिका में ब्लॉग और पत्रिका के मिले जुले गुण हैं। आम पत्रिका/वेबज़ीन में आप लेख के साथ टिप्पणी नहीं लिखते, न ही टिप्पणी वहाँ दिखती है। निरंतर पर लेख ब्लॉग पोस्ट की ही शक्ल में होते हैं। पत्रिका इसलिये क्योंकि ये ब्लॉग की तरह लगातार अपडेट नहीं होती, क्रोनोलाजी का पोस्टवार महत्व नहीं है और क्योंकि, दरअसल ये एक पत्रिका ही है। आपने कहा की निरंतर ब्लॉगज़ीन कम लगती है, तो कृपया मुझे बतायें कि ब्लॉगज़ीन से आप क्या समझते हैं? मुझे नहीं लगता कि निरंतर के पहले हिन्दी लेखन समुदाय में इस शब्द को कभी सुना कहा गया होगा।</p>
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		<title>By: Debashish</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/251#comment-6828</link>
		<dc:creator>Debashish</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 22 Jul 2007 15:42:35 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;blockquote&gt;मगर मुझे लगता है कि आपने भी इसे तरजीह देकर ठीक नहीं किया. रजनीश का वह पोस्ट खुद ही अपनी मौत मर जाता.&lt;/blockquote&gt;&lt;b&gt;रवि भैया&lt;/b&gt; हो सकता है मैंने गलती की। पर मैंने जवाब इसीलिये दिया क्योंकि रजनीश पुराने चिट्ठाकार रहे हैं, उनको इग्नोर नहीं कर सकता। अभी अपने चिट्ठे पर उनका कहना है कि "क्या ब्लॉगज़ीन शब्द के कहीं मायने बताये गये हैं", सवाल ये है कि क्या उन्होंने मायने खोजने की कोशिश की? ज्यादा दूर नहीं निरंतर के अबाउट पृष्ठ तक जाना होता। इसी लिये मैंने इसे ट्रॉलिंग कहा क्योंकि ध्यानार्कषित करने के लिये उन्होंने बस कीचड़ उछाल दिया, न कोई तफ्तीश की, ना कुछ सोचा। चुंकि ब्लॉगज़ीन शब्द का अर्थ वे नहीं जानते, या उन्हें अटपटा लगा और सर्वज्ञ पर विवरण से खीज हुई, तो क्षोभ हम पर निकाल दिया। क्या इस पर सब्र धरे बैठा रहना उचित था? मेरा पक्ष फिर कौन, कहाँ रखता?

&lt;b&gt;अनुराग, अनुनादः&lt;/b&gt; मेरे ख्याल से ये मैं अक्सर करता रहा हूँ, संभव है कि मेरे सब्र की सीमा आप लोगों से, जीतू से कम हो। हो सकता है चुप रहने से पोस्ट "अपनी मौत मर जाता" पर हो सकता है कि ये कई पाठकों के मन में संशय भी छोड़ जाता। मामले का दूसरा पक्ष रख कर मैंने पलड़ा बराबर कर दिया। अब दोनों की राय के आधार पर जो राय बनायेगा मुझे मंजूर होगा।

&lt;b&gt;नीरज:&lt;/b&gt; कल्पना करें कि अरुण की ये टिप्पणीयाँ आप के ब्लॉग पर की जा रही हों। मुझे टिप्पणियाँ हटाना अच्छा नहीं लगता और मुंहतोड़ जवाब देने में मुझे कोई बुराई नज़र नहीं आती। अगले को भी पता चल जाता है वो मनमानी नहीं कर सकता।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>मगर मुझे लगता है कि आपने भी इसे तरजीह देकर ठीक नहीं किया. रजनीश का वह पोस्ट खुद ही अपनी मौत मर जाता.</p></blockquote>
<p><b>रवि भैया</b> हो सकता है मैंने गलती की। पर मैंने जवाब इसीलिये दिया क्योंकि रजनीश पुराने चिट्ठाकार रहे हैं, उनको इग्नोर नहीं कर सकता। अभी अपने चिट्ठे पर उनका कहना है कि &#8220;क्या ब्लॉगज़ीन शब्द के कहीं मायने बताये गये हैं&#8221;, सवाल ये है कि क्या उन्होंने मायने खोजने की कोशिश की? ज्यादा दूर नहीं निरंतर के अबाउट पृष्ठ तक जाना होता। इसी लिये मैंने इसे ट्रॉलिंग कहा क्योंकि ध्यानार्कषित करने के लिये उन्होंने बस कीचड़ उछाल दिया, न कोई तफ्तीश की, ना कुछ सोचा। चुंकि ब्लॉगज़ीन शब्द का अर्थ वे नहीं जानते, या उन्हें अटपटा लगा और सर्वज्ञ पर विवरण से खीज हुई, तो क्षोभ हम पर निकाल दिया। क्या इस पर सब्र धरे बैठा रहना उचित था? मेरा पक्ष फिर कौन, कहाँ रखता?</p>
<p><b>अनुराग, अनुनादः</b> मेरे ख्याल से ये मैं अक्सर करता रहा हूँ, संभव है कि मेरे सब्र की सीमा आप लोगों से, जीतू से कम हो। हो सकता है चुप रहने से पोस्ट &#8220;अपनी मौत मर जाता&#8221; पर हो सकता है कि ये कई पाठकों के मन में संशय भी छोड़ जाता। मामले का दूसरा पक्ष रख कर मैंने पलड़ा बराबर कर दिया। अब दोनों की राय के आधार पर जो राय बनायेगा मुझे मंजूर होगा।</p>
<p><b>नीरज:</b> कल्पना करें कि अरुण की ये टिप्पणीयाँ आप के ब्लॉग पर की जा रही हों। मुझे टिप्पणियाँ हटाना अच्छा नहीं लगता और मुंहतोड़ जवाब देने में मुझे कोई बुराई नज़र नहीं आती। अगले को भी पता चल जाता है वो मनमानी नहीं कर सकता।</p>
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		<title>By: जीतू</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/251#comment-6825</link>
		<dc:creator>जीतू</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 22 Jul 2007 08:23:51 +0000</pubDate>
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		<description>भई, आजकल तो ट्रैन्ड है, 
किसी स्थापित व्यक्ति/संस्था को गाली दो, हिट्स मिलेंगे। कुछ तो असंतुष्ट होंगे ही ग्रुप मे, वो अपनी भड़ास निकालेंगे और आपके पीछे हो लेंगे। जिसको गाली दी, वो भी कम से कम चार लोगों को जरुर ही पढाएगा और फिर अपना पक्ष रखेगा। सीधा सीधा गेम प्लान है, हिट्स पाने का। लेकिन मेरे विचार से लानत है इस गन्दे खेल पर। ब्लॉग होता है अभिव्यक्ति के लिए, ना कि हिट्स के लिए। आप अपने लिए लिखे, अच्छा लिखे, रचनात्मक लिखे।

देबू भाई,  कोई भी १००% संतुष्ट नही होता इस जगत में, ऐसे लोगों को इग्नोर करें। मौज मे रहे और अपना अच्छा लेखन चालू रखें।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भई, आजकल तो ट्रैन्ड है,<br />
किसी स्थापित व्यक्ति/संस्था को गाली दो, हिट्स मिलेंगे। कुछ तो असंतुष्ट होंगे ही ग्रुप मे, वो अपनी भड़ास निकालेंगे और आपके पीछे हो लेंगे। जिसको गाली दी, वो भी कम से कम चार लोगों को जरुर ही पढाएगा और फिर अपना पक्ष रखेगा। सीधा सीधा गेम प्लान है, हिट्स पाने का। लेकिन मेरे विचार से लानत है इस गन्दे खेल पर। ब्लॉग होता है अभिव्यक्ति के लिए, ना कि हिट्स के लिए। आप अपने लिए लिखे, अच्छा लिखे, रचनात्मक लिखे।</p>
<p>देबू भाई,  कोई भी १००% संतुष्ट नही होता इस जगत में, ऐसे लोगों को इग्नोर करें। मौज मे रहे और अपना अच्छा लेखन चालू रखें।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: ANUNAD</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/251#comment-6824</link>
		<dc:creator>ANUNAD</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 22 Jul 2007 06:28:17 +0000</pubDate>
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		<description>सभी लोग सारहीन बातों की अनदेखी करें, इसी में हिन्दी चिट्ठाजगत की भलाई है।
मेरे खयाल से रजनीश का पोस्ट भी अनावश्यक था और आप का स्पष्टीकरण भी।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सभी लोग सारहीन बातों की अनदेखी करें, इसी में हिन्दी चिट्ठाजगत की भलाई है।<br />
मेरे खयाल से रजनीश का पोस्ट भी अनावश्यक था और आप का स्पष्टीकरण भी।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: अनुराग</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/251#comment-6823</link>
		<dc:creator>अनुराग</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 22 Jul 2007 06:12:33 +0000</pubDate>
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		<description>इग्नोर माने पता है?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>इग्नोर माने पता है?</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: नीरज रोहिल्ला</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/251#comment-6822</link>
		<dc:creator>नीरज रोहिल्ला</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 22 Jul 2007 05:38:39 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;blockquote&gt;"बाज़ आ जाओ, हर किसी के सब्र की हद होती है, तुम शिशुपाल नहीं कि सौ गुनाह माफ कर दिये जायेंगे।"&lt;/blockquote&gt;देबाशीशजी, शायद पहली बार आपके चिट्ठे पर टिप्पणी लिख रहा हूँ, लेकिन इस प्रकार के शब्दों के प्रयोग करने का क्या अर्थ हो सकता है । ऐसी टिप्पणियाँ लिखकर आप फ़िजूल में मुद्दे को हवा दे रहे हैं ।

क्या हिन्दी चिट्ठाजगत में सच में आपसी संवाद की ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है कि अगर आप मेरे साथ नहीं हैं तो आप मेरे विरोधी हैं । आप वरिष्ठ चिट्ठाकार हैं और आशा करता हूँ मेरी टिप्पणी को सकारात्मक रूप में लेंगे ।

साभार,</description>
		<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>&#8220;बाज़ आ जाओ, हर किसी के सब्र की हद होती है, तुम शिशुपाल नहीं कि सौ गुनाह माफ कर दिये जायेंगे।&#8221;</p></blockquote>
<p>देबाशीशजी, शायद पहली बार आपके चिट्ठे पर टिप्पणी लिख रहा हूँ, लेकिन इस प्रकार के शब्दों के प्रयोग करने का क्या अर्थ हो सकता है । ऐसी टिप्पणियाँ लिखकर आप फ़िजूल में मुद्दे को हवा दे रहे हैं ।</p>
<p>क्या हिन्दी चिट्ठाजगत में सच में आपसी संवाद की ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है कि अगर आप मेरे साथ नहीं हैं तो आप मेरे विरोधी हैं । आप वरिष्ठ चिट्ठाकार हैं और आशा करता हूँ मेरी टिप्पणी को सकारात्मक रूप में लेंगे ।</p>
<p>साभार,</p>
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	<item>
		<title>By: संजय बेंगाणी</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/251#comment-6820</link>
		<dc:creator>संजय बेंगाणी</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 22 Jul 2007 05:26:46 +0000</pubDate>
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		<description>इन दिनो आपसी सहयोग व बन्धूत्त्व की बात हो रही है और रजनीश भाई की तरफ से जो लिखा गया आश्चर्य जगाने वाला था. थोड़ा विचित्र लगा क्यों की पहली ब्लोगजीन होने का दावा आज का नहीं है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>इन दिनो आपसी सहयोग व बन्धूत्त्व की बात हो रही है और रजनीश भाई की तरफ से जो लिखा गया आश्चर्य जगाने वाला था. थोड़ा विचित्र लगा क्यों की पहली ब्लोगजीन होने का दावा आज का नहीं है.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: रवि</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/251#comment-6819</link>
		<dc:creator>रवि</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 22 Jul 2007 05:18:30 +0000</pubDate>
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		<description>रजनीश तो पहले भी अपने तेवर चिट्ठाकार पर दिखाते रहे हैं. आश्चर्य है कि निरंतर पर उनकी नींद दो साल बाद खुली. मगर मुझे लगता है कि आपने भी इसे तरजीह देकर ठीक नहीं किया. रजनीश का वह पोस्ट खुद ही अपनी मौत मर जाता. आपके इस पोस्ट के कारण मुझे भी ये नई रजनीशी बात पता चली!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>रजनीश तो पहले भी अपने तेवर चिट्ठाकार पर दिखाते रहे हैं. आश्चर्य है कि निरंतर पर उनकी नींद दो साल बाद खुली. मगर मुझे लगता है कि आपने भी इसे तरजीह देकर ठीक नहीं किया. रजनीश का वह पोस्ट खुद ही अपनी मौत मर जाता. आपके इस पोस्ट के कारण मुझे भी ये नई रजनीशी बात पता चली!</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Pankaj Bengani</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/251#comment-6818</link>
		<dc:creator>Pankaj Bengani</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 22 Jul 2007 05:11:36 +0000</pubDate>
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		<description>शुक्र है उन्होने तरकश को बख्श दिया. हम कृतार्थ हुए. ;)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शुक्र है उन्होने तरकश को बख्श दिया. हम कृतार्थ हुए. <img src='http://nuktachini.debashish.com/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' /></p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: मनीष</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/251#comment-6817</link>
		<dc:creator>मनीष</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 22 Jul 2007 05:06:21 +0000</pubDate>
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		<description>खैर आपकी पत्रिका सबसे पहली है इस में तो कोई शक हो ही नहीं सकता। पर मुझे वो चिट्ठा पत्रिका के बजाए अंतरजालीय पत्रिका यानि वेबजीन ज्यादा लगती है , क्यूँ लगती है इसके बारे में &lt;a href="http://ek-shaam-mere-naam.blogspot.com/2007/04/blog-post_24.html" rel="nofollow"&gt;पहले कह चुका&lt;/a&gt; हूँ और आज जब निरंतर की बात चली है तो पुनः व्यक्त कर रहा हूँ

&lt;blockquote&gt;"ब्लॉगजीन कहलाने वाली ये पत्रिकाएँ मुझे वेबजीन ज्यादा और ब्लॉगजीन कम लगती हैं। वेबजीनों की तरह यहाँ भी संपादक मंडल एक्सक्लयूसिव रचनाओं की मांग करते हैं और फिर चिट्ठाकारों की लिखी इन रचनाओं को चिट्ठाकारों से पढ़ने की गुजारिश करते हैं। मेरी समझ से एक अच्छी ब्लॉगजीन  वो है जो चिट्ठे में लिखी जाने वाली अच्छी रचनाओं को छांटे और उसे उस पाठक वर्ग तक पहुँचाए जो अच्छा हिंदी लेखन पढ़ने के लिए इच्छुक है पर जिसके पास रोज सारे चिट्ठों को पढ़ने का समय नहीं है। चिट्ठे में लिखे जाने वाली सामग्री और पत्रिकाओं में छपने वाली रचनाओं मे यही तो अंतर है कि ये अनगढ़ होती हैं, इसे लिखते वक्त लेखक के सामने संपादक की इच्छाओं की तलवार नहीं लटका करती । इसीलिए इनमें ताजगी का वो पुट होता है जो कई बार सावधानी से गढ़ी हुई रचनाओं में नदारद होता है। और यही तो एक चिट्ठे के स्वाभाविक रूप को उजागर करती हैं जो किसी भी ब्लॉगजीन कहलाने वाली पत्रिका का पहला उद्देश्य होना चाहिए। आशा है इतनी मेहनत से पत्रिका चलाने वाले लोग इस बात पर ध्यान देंगे।"&lt;/blockquote&gt;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>खैर आपकी पत्रिका सबसे पहली है इस में तो कोई शक हो ही नहीं सकता। पर मुझे वो चिट्ठा पत्रिका के बजाए अंतरजालीय पत्रिका यानि वेबजीन ज्यादा लगती है , क्यूँ लगती है इसके बारे में <a href="http://ek-shaam-mere-naam.blogspot.com/2007/04/blog-post_24.html" rel="nofollow">पहले कह चुका</a> हूँ और आज जब निरंतर की बात चली है तो पुनः व्यक्त कर रहा हूँ</p>
<blockquote><p>&#8220;ब्लॉगजीन कहलाने वाली ये पत्रिकाएँ मुझे वेबजीन ज्यादा और ब्लॉगजीन कम लगती हैं। वेबजीनों की तरह यहाँ भी संपादक मंडल एक्सक्लयूसिव रचनाओं की मांग करते हैं और फिर चिट्ठाकारों की लिखी इन रचनाओं को चिट्ठाकारों से पढ़ने की गुजारिश करते हैं। मेरी समझ से एक अच्छी ब्लॉगजीन  वो है जो चिट्ठे में लिखी जाने वाली अच्छी रचनाओं को छांटे और उसे उस पाठक वर्ग तक पहुँचाए जो अच्छा हिंदी लेखन पढ़ने के लिए इच्छुक है पर जिसके पास रोज सारे चिट्ठों को पढ़ने का समय नहीं है। चिट्ठे में लिखे जाने वाली सामग्री और पत्रिकाओं में छपने वाली रचनाओं मे यही तो अंतर है कि ये अनगढ़ होती हैं, इसे लिखते वक्त लेखक के सामने संपादक की इच्छाओं की तलवार नहीं लटका करती । इसीलिए इनमें ताजगी का वो पुट होता है जो कई बार सावधानी से गढ़ी हुई रचनाओं में नदारद होता है। और यही तो एक चिट्ठे के स्वाभाविक रूप को उजागर करती हैं जो किसी भी ब्लॉगजीन कहलाने वाली पत्रिका का पहला उद्देश्य होना चाहिए। आशा है इतनी मेहनत से पत्रिका चलाने वाले लोग इस बात पर ध्यान देंगे।&#8221;</p></blockquote>
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