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	<title>Comments on: ब्लॉगिंग में छुआछूतः बद से बदतर भला?</title>
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	<description>निंदक नीयर राखिये</description>
	<pubDate>Thu, 24 Jul 2008 22:52:35 +0000</pubDate>
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		<title>By: yashwant</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/269#comment-6944</link>
		<dc:creator>yashwant</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 11 Sep 2007 15:51:17 +0000</pubDate>
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		<description>bhayi...maine aaj syber cafe me baith kar ye past n comments padhe. mera jo computer tha, uspe devashish ke blog ke shabd agdam-bagdam dikhte hai. 

Debu ji, aapko baaten prabhawshali hain lekin hawa-hawayi hain.... aap ki sochdaani ki apni simaayen hain. lekin debate start karne ke liye saadhuwaad. es post n comments ko mai bhadas pe daalen jaa reha hu. jidhar baitha hu udhar hindi type karne ke pryas me ek-do ghante kharch karne ki bajay maine roman mi likhna jyaada uchit samjha. ummid hai aap maaf karenge aur blogs ke baare me essi tarah likhte rahenge. mera propsal hai ki aap ek saptahik column apne blog pe shuru kariye, blogo me andarkhane chal rahi dhamachaukdi ke upar...

thanks n regards

yashwant</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>bhayi&#8230;maine aaj syber cafe me baith kar ye past n comments padhe. mera jo computer tha, uspe devashish ke blog ke shabd agdam-bagdam dikhte hai. </p>
<p>Debu ji, aapko baaten prabhawshali hain lekin hawa-hawayi hain&#8230;. aap ki sochdaani ki apni simaayen hain. lekin debate start karne ke liye saadhuwaad. es post n comments ko mai bhadas pe daalen jaa reha hu. jidhar baitha hu udhar hindi type karne ke pryas me ek-do ghante kharch karne ki bajay maine roman mi likhna jyaada uchit samjha. ummid hai aap maaf karenge aur blogs ke baare me essi tarah likhte rahenge. mera propsal hai ki aap ek saptahik column apne blog pe shuru kariye, blogo me andarkhane chal rahi dhamachaukdi ke upar&#8230;</p>
<p>thanks n regards</p>
<p>yashwant</p>
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		<title>By: श्रीश शर्मा</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/269#comment-6943</link>
		<dc:creator>श्रीश शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 11 Sep 2007 14:55:42 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत सुन्दर लेख। बाकी साधारण सा नियम है कि:

सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, मा ब्रूयात सत्यं अप्रियम।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत सुन्दर लेख। बाकी साधारण सा नियम है कि:</p>
<p>सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, मा ब्रूयात सत्यं अप्रियम।</p>
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		<title>By: अनूप शुक्ल</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/269#comment-6942</link>
		<dc:creator>अनूप शुक्ल</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Sep 2007 12:16:35 +0000</pubDate>
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		<description>अपनी बात अच्छी तरह से कह ली। यशवंतजी ने कल बताया कि वो अपने 'टारगेट पाठकों' के लिये लिखते है। दूर-दराज के इलाके के पत्रकार उनके 'टारगेट पाठक' हैं। अविनाश से ज्यादा बात नहीं हो पायी लेकिन जितनी हो पायी उसमें मैंने कहा- मोहल्ले में बहस के चक्कर में अक्सर मामला खिच़ड़ी हो जाता है। समझ नहीं आता। उनका कहना था-जो खिच़ड़ी लगता है उसे आप इग्नोर कर दीजिये। इस सहज बात के बाद कुछ और कहने को रह नहीं जाता। 

मुझे अच्छी तरह याद है कि जब तुमने कमेंट किया था मेरे ब्लाग की भाषा पर फिर उसके बाद मैंने पोस्ट लिखी थी तुम्हारी खिंचाई करते हुये। फिर तुमने कमेंट किया था जिसमें अपने कमेंट के लिये अफसोस जाहिर किया था। तुमको खराब लगा यह सोचकर मैंने तुमको मेल लिखी। फोन किया। ताकि अपना अफसोस जाहिर कर सकूं अपनी पोस्ट के लिये। 

तो यह व्यक्ति के अपनी समझ के ऊपर है कि वो किसी चीज को कैसे लेना चाहते है। अपने विचार के अनुसार तर्क भी गढ़ लिये जाते हैं। तर्क शास्त्रियों की आउटसोर्सिंग भी होती है भाई! 

वैसे ये भी एक रंग है। हर तरह के रंग आ रहे हैं। ब्लागिंग रंग-बिरंगी हो रही है। सही है। लगे रहो। बाकी फिर कभी!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अपनी बात अच्छी तरह से कह ली। यशवंतजी ने कल बताया कि वो अपने &#8216;टारगेट पाठकों&#8217; के लिये लिखते है। दूर-दराज के इलाके के पत्रकार उनके &#8216;टारगेट पाठक&#8217; हैं। अविनाश से ज्यादा बात नहीं हो पायी लेकिन जितनी हो पायी उसमें मैंने कहा- मोहल्ले में बहस के चक्कर में अक्सर मामला खिच़ड़ी हो जाता है। समझ नहीं आता। उनका कहना था-जो खिच़ड़ी लगता है उसे आप इग्नोर कर दीजिये। इस सहज बात के बाद कुछ और कहने को रह नहीं जाता। </p>
<p>मुझे अच्छी तरह याद है कि जब तुमने कमेंट किया था मेरे ब्लाग की भाषा पर फिर उसके बाद मैंने पोस्ट लिखी थी तुम्हारी खिंचाई करते हुये। फिर तुमने कमेंट किया था जिसमें अपने कमेंट के लिये अफसोस जाहिर किया था। तुमको खराब लगा यह सोचकर मैंने तुमको मेल लिखी। फोन किया। ताकि अपना अफसोस जाहिर कर सकूं अपनी पोस्ट के लिये। </p>
<p>तो यह व्यक्ति के अपनी समझ के ऊपर है कि वो किसी चीज को कैसे लेना चाहते है। अपने विचार के अनुसार तर्क भी गढ़ लिये जाते हैं। तर्क शास्त्रियों की आउटसोर्सिंग भी होती है भाई! </p>
<p>वैसे ये भी एक रंग है। हर तरह के रंग आ रहे हैं। ब्लागिंग रंग-बिरंगी हो रही है। सही है। लगे रहो। बाकी फिर कभी!</p>
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		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/269#comment-6941</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Sep 2007 11:34:18 +0000</pubDate>
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		<description>एक बार फिर से वही बहस यहां होती दिख रही है। जब तक कोई सत्य कह रहा है, उसकी अभिव्यक्ति को पर्याप्त स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। यदि उसके सत्य कहने का तरीका अप्रिय या अशोभनीय हो तो यह सुनने वाले पर निर्भर करता है कि वह उस अप्रिय सत्य को सुन-समझकर ग्रहण कर ले, या फिर नजरंदाज कर दे। 

लेकिन यह बात हर किसी को याद रखनी होगी कि अभिव्यक्ति का चाहे जो भी माध्यम चुना जाए, उसकी स्वतंत्रता उस देश के संविधान और क़ानूनों के अध्यधीन ही होती है। यदि किसी की अभिव्यक्ति से देश के क़ानूनों का उल्लंघन होगा, तो उसे नतीजे भुगतने के लिए भी तैयार रहना चाहिए, चाहे वह कोई पत्रकार हो, कलाकार हो, ब्लॉगर हो या कोई अन्य नागरिक।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>एक बार फिर से वही बहस यहां होती दिख रही है। जब तक कोई सत्य कह रहा है, उसकी अभिव्यक्ति को पर्याप्त स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। यदि उसके सत्य कहने का तरीका अप्रिय या अशोभनीय हो तो यह सुनने वाले पर निर्भर करता है कि वह उस अप्रिय सत्य को सुन-समझकर ग्रहण कर ले, या फिर नजरंदाज कर दे। </p>
<p>लेकिन यह बात हर किसी को याद रखनी होगी कि अभिव्यक्ति का चाहे जो भी माध्यम चुना जाए, उसकी स्वतंत्रता उस देश के संविधान और क़ानूनों के अध्यधीन ही होती है। यदि किसी की अभिव्यक्ति से देश के क़ानूनों का उल्लंघन होगा, तो उसे नतीजे भुगतने के लिए भी तैयार रहना चाहिए, चाहे वह कोई पत्रकार हो, कलाकार हो, ब्लॉगर हो या कोई अन्य नागरिक।</p>
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		<title>By: अविनाश</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/269#comment-6940</link>
		<dc:creator>अविनाश</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Sep 2007 10:49:48 +0000</pubDate>
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		<description>जीतू जी, आप बात ही नहीं समझ रहे, तो कितना समझाया जाए।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जीतू जी, आप बात ही नहीं समझ रहे, तो कितना समझाया जाए।</p>
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		<title>By: kripa shankar</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/269#comment-6939</link>
		<dc:creator>kripa shankar</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Sep 2007 10:28:16 +0000</pubDate>
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		<description>मजा आ गया आपके विचार पढ़कर। सवाल वही है कि आखिर कब तक हम थोथे आर्दशों को अपने ऊपर ओढ़ते रहेंगे। क्यों हम दूसरे के पीछे-पीछे चलते रहना चाहते हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मजा आ गया आपके विचार पढ़कर। सवाल वही है कि आखिर कब तक हम थोथे आर्दशों को अपने ऊपर ओढ़ते रहेंगे। क्यों हम दूसरे के पीछे-पीछे चलते रहना चाहते हैं।</p>
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		<title>By: masijeevi</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/269#comment-6938</link>
		<dc:creator>masijeevi</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Sep 2007 10:08:26 +0000</pubDate>
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		<description>कल की बैठक में सवाल सीधा दागा था यशवंत पर - "क्‍या यार इरादे क्‍या हैं, योजना क्‍या है, पता भी है कि आप धुरी बन रहे हो और यह भी कि नारद विरोधी रवैया त्‍यागों मित्र , नारद अब विरोध करने लायक चीज नहीं है, संरक्षण लायक चीज हो गई है (ऐतिहासिक मान्‍यूमेंट  टाईप)". यशवंत की राय साफ थी कि भई लर्निंग प्रोसेस में है और ये भी कहा कि आप न जाने क्‍यों पढते हैं हमारे आर्गेट पाठक आप नहीं है वरन वे कस्‍बाई पत्रकार हैं जिनमें भड़ास भरी हुई है- शुचितावादी जहॉं चाहें जाएं। इस आत्‍मविवास व साफगोई के बाद इतना तो मानना ही होगा कि भाषा पर उनकी समझ के ठीक ठाक होने के पेशेवर आधार हैं, उनमें से अधिकांश पत्रकार हैं तथा भाषा से उनका नाता वैसे ही है जैसे कि बढई का रंदे से होता है।

वैसे किसी नए ब्‍लॉगर मित्र ने कहा, "भड़ास और नारद में ज्यादा अन्तर नहीं है. दोनों की भाषा अलग है लेकिन असहमति के लिए दोनों के पास कोई जगह नहीं है. नारद वाले माँ... ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करते हैं, भडास वाले करते हैं. इसके सिवा दोनों 1 जैसे हैं, जिसकी बात उनको अच्छी नहीं लगती वो विरोधी है. भड़ास वालों के लिए वो नारद वाला है, और नारद वालों के लिए वो भडास वाला।" इसलिए साफ है कि भड़ास और उससे असहमतियों दोनों का अपना लोकतांत्रिक स्‍पेस है जिसे वे इस्‍तेमाल कर रहे हैं। भड़ास के बाद राहुल शिष्‍ट दिखने लगे :))

वैसे स्‍त्रीवादी ब्‍लॉगिंग समुदाय ने भड़ास और बाकी लोगों की भाषा का विरोध किया तो है - शुचिता के आग्रह में नहीं पर स्‍त्रीविरोधी तेवर के लिए।

पर जाहिर है कि बहस जारी रहने वाली है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कल की बैठक में सवाल सीधा दागा था यशवंत पर - &#8220;क्‍या यार इरादे क्‍या हैं, योजना क्‍या है, पता भी है कि आप धुरी बन रहे हो और यह भी कि नारद विरोधी रवैया त्‍यागों मित्र , नारद अब विरोध करने लायक चीज नहीं है, संरक्षण लायक चीज हो गई है (ऐतिहासिक मान्‍यूमेंट  टाईप)&#8221;. यशवंत की राय साफ थी कि भई लर्निंग प्रोसेस में है और ये भी कहा कि आप न जाने क्‍यों पढते हैं हमारे आर्गेट पाठक आप नहीं है वरन वे कस्‍बाई पत्रकार हैं जिनमें भड़ास भरी हुई है- शुचितावादी जहॉं चाहें जाएं। इस आत्‍मविवास व साफगोई के बाद इतना तो मानना ही होगा कि भाषा पर उनकी समझ के ठीक ठाक होने के पेशेवर आधार हैं, उनमें से अधिकांश पत्रकार हैं तथा भाषा से उनका नाता वैसे ही है जैसे कि बढई का रंदे से होता है।</p>
<p>वैसे किसी नए ब्‍लॉगर मित्र ने कहा, &#8220;भड़ास और नारद में ज्यादा अन्तर नहीं है. दोनों की भाषा अलग है लेकिन असहमति के लिए दोनों के पास कोई जगह नहीं है. नारद वाले माँ&#8230; ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करते हैं, भडास वाले करते हैं. इसके सिवा दोनों 1 जैसे हैं, जिसकी बात उनको अच्छी नहीं लगती वो विरोधी है. भड़ास वालों के लिए वो नारद वाला है, और नारद वालों के लिए वो भडास वाला।&#8221; इसलिए साफ है कि भड़ास और उससे असहमतियों दोनों का अपना लोकतांत्रिक स्‍पेस है जिसे वे इस्‍तेमाल कर रहे हैं। भड़ास के बाद राहुल शिष्‍ट दिखने लगे :))</p>
<p>वैसे स्‍त्रीवादी ब्‍लॉगिंग समुदाय ने भड़ास और बाकी लोगों की भाषा का विरोध किया तो है - शुचिता के आग्रह में नहीं पर स्‍त्रीविरोधी तेवर के लिए।</p>
<p>पर जाहिर है कि बहस जारी रहने वाली है।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Sanjeet Tripathi</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/269#comment-6937</link>
		<dc:creator>Sanjeet Tripathi</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Sep 2007 09:49:30 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत सधी हुई बात कही आपने, विचार के बाद हम यही सकते हैं कि सहमत!

साहित्य में भदेस भाषा के प्रयोग से सहमत होते हुए, जीतू भाई की इस बात से भी मैं सहमत होना चाहूंगा कि कहीं ऐसे ही भदेस भाषा के अधिकाधिक प्रयोग के आधार पर ही कहीं सारे ब्लॉगमण्डल पर पाबंदी की नौबत ना आ जाए!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत सधी हुई बात कही आपने, विचार के बाद हम यही सकते हैं कि सहमत!</p>
<p>साहित्य में भदेस भाषा के प्रयोग से सहमत होते हुए, जीतू भाई की इस बात से भी मैं सहमत होना चाहूंगा कि कहीं ऐसे ही भदेस भाषा के अधिकाधिक प्रयोग के आधार पर ही कहीं सारे ब्लॉगमण्डल पर पाबंदी की नौबत ना आ जाए!</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: कमलेश मदान</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/269#comment-6936</link>
		<dc:creator>कमलेश मदान</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Sep 2007 09:16:08 +0000</pubDate>
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		<description>इस लेख को मैं आपका अब तक का सर्वश्रेष्ठ लेख कहूंगा क्योंकि कुछ लोग जो अपने पेशे से अध्यापक,पत्रकार और संवेदनशील लेखक है उनको शायद नये ब्लॉगरों का प्रतोरोध करने का साहस ही नहीं है ये बात आपने सच कही कि आप जो ब्लॉग पर लिखते है वो अपने जीवन में भी उतार पायें तो हम आपकी लेखनी को एक प्रेरणा समझेंगें लेकिन उनको डर है कि अगर वो अच्छा लिखेंगें तो उनके प्रशंसको की संख्या में गिरावट आयेगी जो उन्हें पसंद नहीं.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>इस लेख को मैं आपका अब तक का सर्वश्रेष्ठ लेख कहूंगा क्योंकि कुछ लोग जो अपने पेशे से अध्यापक,पत्रकार और संवेदनशील लेखक है उनको शायद नये ब्लॉगरों का प्रतोरोध करने का साहस ही नहीं है ये बात आपने सच कही कि आप जो ब्लॉग पर लिखते है वो अपने जीवन में भी उतार पायें तो हम आपकी लेखनी को एक प्रेरणा समझेंगें लेकिन उनको डर है कि अगर वो अच्छा लिखेंगें तो उनके प्रशंसको की संख्या में गिरावट आयेगी जो उन्हें पसंद नहीं.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: जीतू</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/269#comment-6935</link>
		<dc:creator>जीतू</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Sep 2007 08:38:21 +0000</pubDate>
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		<description>अविनाश बाबू,

वैसे तो मै किसी बहस मे पड़ना नही चाहता क्योंकि आप बहस मे मुद्दे से उठकर, व्यक्तिगत स्तर पर उतर आते है। सिर्फ़ एक उदाहरण देना चाहता हूँ। 

हिन्दी न्यूज चैनल हमारे देश में खबरों का स्त्रोत हुआ करते थे, टीआरपी, अभिव्यक्ति, जागरुकता और आम आदमी के समाचारों के नाम पर आजकल क्या परोसा जा रहा है उससे कुछ छिपा नही। टीआरपी की अंधी दौड़ ने चैनलो को (अपराध करके) खबरें बनाने के लिए मजबूर कर दिया है। चैनलो ने सैल्फ़ सैंसरशिप की बात की, तब भी बात बनी नही। अब सरकार जल्दी ही इस पर एक बिल लाने वाली है, जिसमे भाषा और कन्टेन्ट की मर्यादा रखने की बात होगी। इससे &lt;b&gt;कुछ घटिया चैनलों&lt;/b&gt; के साथ साथ कुछ अच्छे चैनल भी प्रभावित होंगे। आम आदमी तो अब तक न्यूज चैनल देखने से वैसे ही तौबा कर चुका है। बस वही हाल हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया का ना हो। 

बाकी भविष्य मे ही सब कुछ लिखा है। हम और आप सिर्फ़ भाषा की मर्यादा बनाए रख सकते है, वो भी यदि आप नही चाहते तो जो मर्जी मे आए करिए।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अविनाश बाबू,</p>
<p>वैसे तो मै किसी बहस मे पड़ना नही चाहता क्योंकि आप बहस मे मुद्दे से उठकर, व्यक्तिगत स्तर पर उतर आते है। सिर्फ़ एक उदाहरण देना चाहता हूँ। </p>
<p>हिन्दी न्यूज चैनल हमारे देश में खबरों का स्त्रोत हुआ करते थे, टीआरपी, अभिव्यक्ति, जागरुकता और आम आदमी के समाचारों के नाम पर आजकल क्या परोसा जा रहा है उससे कुछ छिपा नही। टीआरपी की अंधी दौड़ ने चैनलो को (अपराध करके) खबरें बनाने के लिए मजबूर कर दिया है। चैनलो ने सैल्फ़ सैंसरशिप की बात की, तब भी बात बनी नही। अब सरकार जल्दी ही इस पर एक बिल लाने वाली है, जिसमे भाषा और कन्टेन्ट की मर्यादा रखने की बात होगी। इससे <b>कुछ घटिया चैनलों</b> के साथ साथ कुछ अच्छे चैनल भी प्रभावित होंगे। आम आदमी तो अब तक न्यूज चैनल देखने से वैसे ही तौबा कर चुका है। बस वही हाल हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया का ना हो। </p>
<p>बाकी भविष्य मे ही सब कुछ लिखा है। हम और आप सिर्फ़ भाषा की मर्यादा बनाए रख सकते है, वो भी यदि आप नही चाहते तो जो मर्जी मे आए करिए।</p>
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