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	<title>Comments on: फूलों की सेज नहीं ब्लॉगिंग</title>
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	<description>निंदक नीयर राखिये</description>
	<pubDate>Mon, 12 May 2008 08:14:15 +0000</pubDate>
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		<title>By: vikas</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/306#comment-7439</link>
		<dc:creator>vikas</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 18 Mar 2008 12:03:03 +0000</pubDate>
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		<description>अच्छी जानकारी है. आपकी बात  सही  है की नियमित और और अच्छे लेखन से ही रीडरशिप बनती है. व्यर्थ के वाद विवाद मे पड़ने से हिन्दी ब्लॉग जगत की प्रतिष्ठा पर असर पड़ता है. 
अभी ज़्यादा दिन तो नही हुए हिन्दी ब्लॉग जगत में, पर इतना कह सकता हूँ की अँग्रेज़ी से कही बेहतर स्थिति है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अच्छी जानकारी है. आपकी बात  सही  है की नियमित और और अच्छे लेखन से ही रीडरशिप बनती है. व्यर्थ के वाद विवाद मे पड़ने से हिन्दी ब्लॉग जगत की प्रतिष्ठा पर असर पड़ता है.<br />
अभी ज़्यादा दिन तो नही हुए हिन्दी ब्लॉग जगत में, पर इतना कह सकता हूँ की अँग्रेज़ी से कही बेहतर स्थिति है.</p>
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		<title>By: डा०अमर कुमार</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/306#comment-7424</link>
		<dc:creator>डा०अमर कुमार</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 29 Feb 2008 19:27:58 +0000</pubDate>
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		<description>दादा,
बहुत सारगर्भित जानकारी है इस आलेख में.
किंतु लगे हाथों ब्लाग की सुरक्षा के कुछ उपाय भी सुझा दिये जाते यहाँ,
तो अनेक ब्लागर उपकृत होते । जो तकनीक के जानकार नहीं हैं उनका ऊहापोह
कुछ कम हो जाता ।
सादर अभिवादन</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>दादा,<br />
बहुत सारगर्भित जानकारी है इस आलेख में.<br />
किंतु लगे हाथों ब्लाग की सुरक्षा के कुछ उपाय भी सुझा दिये जाते यहाँ,<br />
तो अनेक ब्लागर उपकृत होते । जो तकनीक के जानकार नहीं हैं उनका ऊहापोह<br />
कुछ कम हो जाता ।<br />
सादर अभिवादन</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: मीनाक्षी धंवंतरि</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/306#comment-7422</link>
		<dc:creator>मीनाक्षी धंवंतरि</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 23 Feb 2008 09:14:30 +0000</pubDate>
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		<description>रोचक और नई जानकारी देने के लिए धन्यवाद !</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>रोचक और नई जानकारी देने के लिए धन्यवाद !</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: अजित वडनेरकर</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/306#comment-7408</link>
		<dc:creator>अजित वडनेरकर</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 18 Feb 2008 08:56:14 +0000</pubDate>
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		<description>देबू भाई, 
माफी चाहता हूं। देर से नज़र पड़ी । आपने इस लेख को यहां छापकर बहुत अच्छा किया , मैं भी सुझाव देने वाला था। उधर अनिल भाई ने भी वही किया। दरअसल मजबूरी वही थी जिसका जिक्र रविभाई और संजयजी कर चुके हैं। आपका लेख भी सबसे आखिर में आया था और वह भी दो हिस्सों में । तब तक स्पेस का बंटवारा हो चुका था :)  हमारा मकसद था ब्लाग पर एक पेज सिर्फ ब्लागरों की मदद से बने जिसके जरिये साधारण पाठक को इस बारे में एक तस्वीर मिले। कुल दस आलेख थे। मोटे तौर पर इस पृष्ठ पर छह आलेख लगते हैं। हमने सभी को समायोजित करना तय किया। दिक्कत यह भी थी कि ज्यादातर आलेख 
( अनामदास और रवीश को छोड़कर ) आकार से बड़े थे। मगर जितनी तत्परता से सभी साथियों ने सामग्री भेजनी शुरू की थी , हम किसी भी आलेख को छोड़ना नहीं चाहते थे। इन दस आलेखों का आकार इतना था कि ऐसे तीन पृष्ठ बनाए जा सकते थे। बहरहाल, कुछ मजबूरियों के बावजूद , हमें लगता है कि काम सार्थक रहा। और ब्लागिंग ने नए दरवाज़े खोले हैं जैसा सभी ने एक सुर में कहा। इसीलिए छपने की निर्भरता खत्म हो गई है। रविजी (अतिथि संपादक) की कैंची का मुकाबला करने के लिए देबूभाई के पास नुक्ताचीनी है :) 
ब्लागजगत जिंदाबाद....</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>देबू भाई,<br />
माफी चाहता हूं। देर से नज़र पड़ी । आपने इस लेख को यहां छापकर बहुत अच्छा किया , मैं भी सुझाव देने वाला था। उधर अनिल भाई ने भी वही किया। दरअसल मजबूरी वही थी जिसका जिक्र रविभाई और संजयजी कर चुके हैं। आपका लेख भी सबसे आखिर में आया था और वह भी दो हिस्सों में । तब तक स्पेस का बंटवारा हो चुका था <img src='http://nuktachini.debashish.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  हमारा मकसद था ब्लाग पर एक पेज सिर्फ ब्लागरों की मदद से बने जिसके जरिये साधारण पाठक को इस बारे में एक तस्वीर मिले। कुल दस आलेख थे। मोटे तौर पर इस पृष्ठ पर छह आलेख लगते हैं। हमने सभी को समायोजित करना तय किया। दिक्कत यह भी थी कि ज्यादातर आलेख<br />
( अनामदास और रवीश को छोड़कर ) आकार से बड़े थे। मगर जितनी तत्परता से सभी साथियों ने सामग्री भेजनी शुरू की थी , हम किसी भी आलेख को छोड़ना नहीं चाहते थे। इन दस आलेखों का आकार इतना था कि ऐसे तीन पृष्ठ बनाए जा सकते थे। बहरहाल, कुछ मजबूरियों के बावजूद , हमें लगता है कि काम सार्थक रहा। और ब्लागिंग ने नए दरवाज़े खोले हैं जैसा सभी ने एक सुर में कहा। इसीलिए छपने की निर्भरता खत्म हो गई है। रविजी (अतिथि संपादक) की कैंची का मुकाबला करने के लिए देबूभाई के पास नुक्ताचीनी है <img src='http://nuktachini.debashish.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /><br />
ब्लागजगत जिंदाबाद&#8230;.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Pradeep Mamgain</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/306#comment-7401</link>
		<dc:creator>Pradeep Mamgain</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 17 Feb 2008 17:25:28 +0000</pubDate>
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		<description>You are absolutely correct. There are few rotten fish in the blogging community. Who just make the whole pond dirty. Nice and informative post.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>You are absolutely correct. There are few rotten fish in the blogging community. Who just make the whole pond dirty. Nice and informative post.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अनूप शुक्ल</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/306#comment-7397</link>
		<dc:creator>अनूप शुक्ल</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 17 Feb 2008 02:21:15 +0000</pubDate>
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		<description>अच्छा ,जानकारी भरा लेख !</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अच्छा ,जानकारी भरा लेख !</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: sanjay</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/306#comment-7384</link>
		<dc:creator>sanjay</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 15 Feb 2008 12:44:52 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://nuktachini.debashish.com/306#comment-7384</guid>
		<description>&#60;शायद अखबार के भाग्‍य में नहीं था इसे पूरा छापना वरना उनके लाखों पाठक इससे लाभ उठा सकते थे।......

आपकी बात सही है, पूरा छपता तो पाठकों को और भी ज्‍यादा लाभ होता लेकिन दूसरा पहलू यह है कि अखबारों के पन्‍नों पर कम स्‍थान में ज्‍यादा से ज्‍यादा सामग्री देने का दबाव हमेशा से रहा है और काम करने वालों को इसके साथ समझौता करना ही पड़ता है. यह पेज चिट्ठाकारों ने स्‍वयं लिखा और उन्‍हीं में से एक ने संपादित किया. 

दूसरी बात स्‍वतंत्र हिदी जालस्‍थलों को विकसित करने के अब तक जो सीमित विकल्‍प उपलब्ध हुए हैं उनसे सिर्फ वही लोग लाभांवित हो सकते हैं जिनके पास पूरा तकनीकी ज्ञान है. जूमला और वर्डप्रेस को ओपन सोर्स के रूप में बहुत ही सीमित कर के उपलब्‍ध कराया गया है. इन्‍हें मनचाहे ढंग से उपयोग करने के लिए आपके पास दो बातें होना आवश्‍यक हैं प्रथम तकनीकी कौशल द्वितीय धन. 

इंटरनैट पर हिंदी के विकास में यही सबसे बड़ी बाधा हे कि स्‍वतंत्र डोमेन लेने के बावजूद उसे स्‍तरीय तरीके से संचालित करने के पूरे औजार आज भी सामान्‍य यूजर की पहुंच में नहीं हैं.  कड़वी सच्‍चाई यह है कि कमाई चंद अपवादों को छोड़कर बड़े जालस्‍थल या फिर अंग्रेजी जालस्‍थलों को ही होती है. ऐसे में व्‍यक्तिगत स्‍तर पर कोई हिंदी का जालस्‍थल चलाने का प्रयास तकनीकी कौशल और आर्थिक कारकों के कारण एक एसी दुरूह चुनौती बन चुका है जिससे निपटना हर किसी के बस की बात नहीं है. 

ब्‍लॉगस्‍पॉट या वर्डप्रेस पर हिंदी चिट्ठों को बड़ी तादाद में बनाने की सबसे बड़ी वजह यही है कि दोनों मुफ्त हैं और बिना किसी परेशानी के कोई भी इन्‍हें उपयोग कर सकता है. लेकिन जब स्‍वतंत्र जालस्‍थल की बात आती है तो ऐसा नहीं हो पाता, या बहुत ही सीमित विकल्‍पों के साथ होता है. इंडिक जूमला का अपडेट वर्शन नहीं है. वर्डप्रेस पर एक आम यूजर सिर्फ ब्‍लॉग ही बना सकता है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&lt;शायद अखबार के भाग्‍य में नहीं था इसे पूरा छापना वरना उनके लाखों पाठक इससे लाभ उठा सकते थे।&#8230;&#8230;</p>
<p>आपकी बात सही है, पूरा छपता तो पाठकों को और भी ज्‍यादा लाभ होता लेकिन दूसरा पहलू यह है कि अखबारों के पन्‍नों पर कम स्‍थान में ज्‍यादा से ज्‍यादा सामग्री देने का दबाव हमेशा से रहा है और काम करने वालों को इसके साथ समझौता करना ही पड़ता है. यह पेज चिट्ठाकारों ने स्‍वयं लिखा और उन्‍हीं में से एक ने संपादित किया. </p>
<p>दूसरी बात स्‍वतंत्र हिदी जालस्‍थलों को विकसित करने के अब तक जो सीमित विकल्‍प उपलब्ध हुए हैं उनसे सिर्फ वही लोग लाभांवित हो सकते हैं जिनके पास पूरा तकनीकी ज्ञान है. जूमला और वर्डप्रेस को ओपन सोर्स के रूप में बहुत ही सीमित कर के उपलब्‍ध कराया गया है. इन्‍हें मनचाहे ढंग से उपयोग करने के लिए आपके पास दो बातें होना आवश्‍यक हैं प्रथम तकनीकी कौशल द्वितीय धन. </p>
<p>इंटरनैट पर हिंदी के विकास में यही सबसे बड़ी बाधा हे कि स्‍वतंत्र डोमेन लेने के बावजूद उसे स्‍तरीय तरीके से संचालित करने के पूरे औजार आज भी सामान्‍य यूजर की पहुंच में नहीं हैं.  कड़वी सच्‍चाई यह है कि कमाई चंद अपवादों को छोड़कर बड़े जालस्‍थल या फिर अंग्रेजी जालस्‍थलों को ही होती है. ऐसे में व्‍यक्तिगत स्‍तर पर कोई हिंदी का जालस्‍थल चलाने का प्रयास तकनीकी कौशल और आर्थिक कारकों के कारण एक एसी दुरूह चुनौती बन चुका है जिससे निपटना हर किसी के बस की बात नहीं है. </p>
<p>ब्‍लॉगस्‍पॉट या वर्डप्रेस पर हिंदी चिट्ठों को बड़ी तादाद में बनाने की सबसे बड़ी वजह यही है कि दोनों मुफ्त हैं और बिना किसी परेशानी के कोई भी इन्‍हें उपयोग कर सकता है. लेकिन जब स्‍वतंत्र जालस्‍थल की बात आती है तो ऐसा नहीं हो पाता, या बहुत ही सीमित विकल्‍पों के साथ होता है. इंडिक जूमला का अपडेट वर्शन नहीं है. वर्डप्रेस पर एक आम यूजर सिर्फ ब्‍लॉग ही बना सकता है.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: कमल शर्मा</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/306#comment-7383</link>
		<dc:creator>कमल शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 15 Feb 2008 10:47:22 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://nuktachini.debashish.com/306#comment-7383</guid>
		<description>पूरा लेख यहां देने और पढ़वाने के लिए धन्‍यवाद। उपयोगी लेख जिसे पूरा पढ़े बगैर रुका नहीं जा सकता। शायद अखबार के भाग्‍य में नहीं था इसे पूरा छापना वरना उनके लाखों पाठक इससे लाभ उठा सकते थे।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पूरा लेख यहां देने और पढ़वाने के लिए धन्‍यवाद। उपयोगी लेख जिसे पूरा पढ़े बगैर रुका नहीं जा सकता। शायद अखबार के भाग्‍य में नहीं था इसे पूरा छापना वरना उनके लाखों पाठक इससे लाभ उठा सकते थे।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: हरिराम</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/306#comment-7382</link>
		<dc:creator>हरिराम</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 15 Feb 2008 10:45:58 +0000</pubDate>
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		<description>आपने ठोस धरातल के सत्य तथ्य उजागर किए हैं। साथ ही, ब्लॉगर या वर्डप्रेस पर हिन्दी में कई तकनीकी समस्याएँ आती हैं। लेआउट विकल्प सीमित हैं। तालिका या तकनीकी विवरण देने की कोई सही प्रणाली नहीं है। चलछवियों, moving Gif या अन्य presentation के लिए दूसरे वेबस्रोतों पर मूल सामग्री रखकर कड़ी देनी पड़ती है। कई संस्थाओं के सर्वरों में .blogsot तथा .wordpress ब्लॉक किया हुआ रहता है। जब चाहे सरकार इनका आक्सेस बन्द कर देती है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपने ठोस धरातल के सत्य तथ्य उजागर किए हैं। साथ ही, ब्लॉगर या वर्डप्रेस पर हिन्दी में कई तकनीकी समस्याएँ आती हैं। लेआउट विकल्प सीमित हैं। तालिका या तकनीकी विवरण देने की कोई सही प्रणाली नहीं है। चलछवियों, moving Gif या अन्य presentation के लिए दूसरे वेबस्रोतों पर मूल सामग्री रखकर कड़ी देनी पड़ती है। कई संस्थाओं के सर्वरों में .blogsot तथा .wordpress ब्लॉक किया हुआ रहता है। जब चाहे सरकार इनका आक्सेस बन्द कर देती है।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: पूनम</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/306#comment-7381</link>
		<dc:creator>पूनम</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 15 Feb 2008 08:35:37 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://nuktachini.debashish.com/306#comment-7381</guid>
		<description>जानकारी रोचक है .सभी चिट्ठाकारों को यह लेख पढना आवश्यक है .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जानकारी रोचक है .सभी चिट्ठाकारों को यह लेख पढना आवश्यक है .</p>
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