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	<title>Comments on: निरंतर पत्रिका की कुछ बातें</title>
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	<description>निंदक नीयर राखिये</description>
	<pubDate>Thu, 24 Jul 2008 22:46:18 +0000</pubDate>
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		<title>By: Debashish</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/321#comment-7465</link>
		<dc:creator>Debashish</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 03 May 2008 04:31:51 +0000</pubDate>
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		<description>पुराने अंको का गायब हो जाना तो सृजन एक अजीब घटना थी और इसका हल निरंतर की सामग्री को कॉपी या पुनर्वितरित करने देने से तो नहीं होता। हमने पहले भी कहा है कि निरंतर की सामग्री को किसी भी प्रिंट प्रकाशन द्वारा प्रकाशित करना हमें स्वीकार्य है अगर श्रेय दिया जाय और पत्रिका का विवरण शामिल किया जाय। चुंकि यह जालपत्रिका है अतः वही सामग्री कहीं और प्रकाशन की अनुमति देना तो उचित नहीं लगता। प्रिंट प्रकाशन हुआ भी है, भारतीय पक्ष में अनूप द्वारा लिया विजय तिवारी का साक्षात्कार छपा है, जाल पत्रिका में उन्होंने हामरे लेख को लिंक किया। सराय के एक आगामी प्रकाशन में शायद हमारे तकनीकी लेख छपें। दरअसल दिक्कत अच्छे लेखकों की, और हमारे किस्म के लेखों के लेखकों की, कमी की है। एक तो हर कोई अपना मंच बनाकर ही लिखना चाहता है, या स्थापित मंच के लिये। दूजे कोलेबोरेटिव लेखन की बात शायद लोग समझ नहीं पा रहे हैं। और मैं इसे ब्लॉग या कम्यूनिटी ब्लॉग की शक्ल नहीं देना चाहता वर्ना गुणवत्ता पर ध्यान रखना असंभव हो जायेगा। हाल फिलहाल निरंतर पर देखें, मैंने बैनर एड हेतु लोगों से गुजारिश की है, अगर हम कुछ राशि इससे कमा सकें तो शायद लेखकों को पारिश्मिक देकर अच्छे लेखन को आकर्षित करना संभव हो। पर यह कयास ही है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पुराने अंको का गायब हो जाना तो सृजन एक अजीब घटना थी और इसका हल निरंतर की सामग्री को कॉपी या पुनर्वितरित करने देने से तो नहीं होता। हमने पहले भी कहा है कि निरंतर की सामग्री को किसी भी प्रिंट प्रकाशन द्वारा प्रकाशित करना हमें स्वीकार्य है अगर श्रेय दिया जाय और पत्रिका का विवरण शामिल किया जाय। चुंकि यह जालपत्रिका है अतः वही सामग्री कहीं और प्रकाशन की अनुमति देना तो उचित नहीं लगता। प्रिंट प्रकाशन हुआ भी है, भारतीय पक्ष में अनूप द्वारा लिया विजय तिवारी का साक्षात्कार छपा है, जाल पत्रिका में उन्होंने हामरे लेख को लिंक किया। सराय के एक आगामी प्रकाशन में शायद हमारे तकनीकी लेख छपें। दरअसल दिक्कत अच्छे लेखकों की, और हमारे किस्म के लेखों के लेखकों की, कमी की है। एक तो हर कोई अपना मंच बनाकर ही लिखना चाहता है, या स्थापित मंच के लिये। दूजे कोलेबोरेटिव लेखन की बात शायद लोग समझ नहीं पा रहे हैं। और मैं इसे ब्लॉग या कम्यूनिटी ब्लॉग की शक्ल नहीं देना चाहता वर्ना गुणवत्ता पर ध्यान रखना असंभव हो जायेगा। हाल फिलहाल निरंतर पर देखें, मैंने बैनर एड हेतु लोगों से गुजारिश की है, अगर हम कुछ राशि इससे कमा सकें तो शायद लेखकों को पारिश्मिक देकर अच्छे लेखन को आकर्षित करना संभव हो। पर यह कयास ही है।</p>
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		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/321#comment-7464</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 02 May 2008 11:36:19 +0000</pubDate>
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		<description>देबू दा,

निरंतर के पुराने अंकों की दुर्लभ और लुप्तप्राय सामग्री को इंटरनेट की अथाह अतल गहराइयों से गोता लगाकर निकाल लाने की आपकी धुन पर आपको दाद देने का मन करता है। परफेक्शन के स्तर को छूने की आपकी सतत जिद आपकी कार्यशैली की खासियत रही है, जिसके कारण निरंतर में शुरु से ही एक अलग किस्म-का निखार झलकता रहा है। उसके पुराने अंकों के खो जाने पर आपके भीतर की बेचैनी और मोह स्वाभाविक है और निरंतर के उस जमाने के पाठकों के भीतर नॉस्टेलजिया का भाव पैदा होना भी स्वाभाविक है। 

ब्लॉग की फितरत जाहिरन पत्रिका की फितरत से अलग है। जैसा कि उन्मुक्त जी ने भी कहा है, निरंतर की सामग्री को एक्सक्लुसिव रखने की नीति को यदि आप बदल दें तो कोई कारण नहीं है कि इतनी अच्छी पत्रिका को असमय ही इंटरनेट के निष्क्रिय आर्काइव में शामिल होने से रोका न जा सके।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>देबू दा,</p>
<p>निरंतर के पुराने अंकों की दुर्लभ और लुप्तप्राय सामग्री को इंटरनेट की अथाह अतल गहराइयों से गोता लगाकर निकाल लाने की आपकी धुन पर आपको दाद देने का मन करता है। परफेक्शन के स्तर को छूने की आपकी सतत जिद आपकी कार्यशैली की खासियत रही है, जिसके कारण निरंतर में शुरु से ही एक अलग किस्म-का निखार झलकता रहा है। उसके पुराने अंकों के खो जाने पर आपके भीतर की बेचैनी और मोह स्वाभाविक है और निरंतर के उस जमाने के पाठकों के भीतर नॉस्टेलजिया का भाव पैदा होना भी स्वाभाविक है। </p>
<p>ब्लॉग की फितरत जाहिरन पत्रिका की फितरत से अलग है। जैसा कि उन्मुक्त जी ने भी कहा है, निरंतर की सामग्री को एक्सक्लुसिव रखने की नीति को यदि आप बदल दें तो कोई कारण नहीं है कि इतनी अच्छी पत्रिका को असमय ही इंटरनेट के निष्क्रिय आर्काइव में शामिल होने से रोका न जा सके।</p>
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	<item>
		<title>By: Unmukt</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/321#comment-7455</link>
		<dc:creator>Unmukt</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 30 Mar 2008 06:56:27 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;blockquote&gt;&lt;em&gt;एक कटु सत्य यह भी है कि निरंतर पर हम जिस तरह के लेख छापते हैं उस तरह के लेखक हमें मिलते नहीं, निरंतर मित्र समूह में तकरीबन 60 सदस्य हैं पर किसी पत्रिका से जुड़ने की बजाय लोग अपने ब्लॉग पर लिखना ज्यादा पसंद करते हैं।&lt;/em&gt;&lt;/blockquote&gt;मेरे विचार से आप पत्रिका का स्वरूप क्यों नहीं बदलते। लोग अपने ही चिट्ठे पर कुछ खास इस पत्रिका के लिये लिखें। उसमें वे पत्रिका संबन्धित टैग दें, ताकि वह इस पत्रिका के उस अंक पर भी दिखे। हमें से हर चिट्ठाकार अपने चिट्ठे में कुछ खास बातें लिखता है। वह इस पत्रिका के लिये हो सकती है। इससे दोनो बातें निभ जायेंगी - उनके चिट्ठे पर चिट्ठी पोस्ट हो जायगी और पत्रिका अंक पूरा हो जायगा। मैंने इस तरह के कुछ जाल स्थल, अंग्रेजी में देखें हैं। मैं समझता हूं कि भविष्य में इस तरह के जाल स्थल बढ़ेंगे। हिन्दी में अभी तक देखने को नहीं मिला। यहीं पर इसका नया प्रयोग किया जाय।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p><em>एक कटु सत्य यह भी है कि निरंतर पर हम जिस तरह के लेख छापते हैं उस तरह के लेखक हमें मिलते नहीं, निरंतर मित्र समूह में तकरीबन 60 सदस्य हैं पर किसी पत्रिका से जुड़ने की बजाय लोग अपने ब्लॉग पर लिखना ज्यादा पसंद करते हैं।</em></p></blockquote>
<p>मेरे विचार से आप पत्रिका का स्वरूप क्यों नहीं बदलते। लोग अपने ही चिट्ठे पर कुछ खास इस पत्रिका के लिये लिखें। उसमें वे पत्रिका संबन्धित टैग दें, ताकि वह इस पत्रिका के उस अंक पर भी दिखे। हमें से हर चिट्ठाकार अपने चिट्ठे में कुछ खास बातें लिखता है। वह इस पत्रिका के लिये हो सकती है। इससे दोनो बातें निभ जायेंगी - उनके चिट्ठे पर चिट्ठी पोस्ट हो जायगी और पत्रिका अंक पूरा हो जायगा। मैंने इस तरह के कुछ जाल स्थल, अंग्रेजी में देखें हैं। मैं समझता हूं कि भविष्य में इस तरह के जाल स्थल बढ़ेंगे। हिन्दी में अभी तक देखने को नहीं मिला। यहीं पर इसका नया प्रयोग किया जाय।</p>
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		<title>By: समीर लाल</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/321#comment-7454</link>
		<dc:creator>समीर लाल</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 28 Mar 2008 16:20:25 +0000</pubDate>
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		<description>आगे जारी रहें...बीती ताहि बिसार दे, आग की सुध ले....देखेंगे इसे जब कभी मौका लगा..अभी तो नया अंक लाईये..शुभकामनायें. कुछ भेजूँ क्या छापने के लिये..हा हा!!  :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आगे जारी रहें&#8230;बीती ताहि बिसार दे, आग की सुध ले&#8230;.देखेंगे इसे जब कभी मौका लगा..अभी तो नया अंक लाईये..शुभकामनायें. कुछ भेजूँ क्या छापने के लिये..हा हा!!  <img src='http://nuktachini.debashish.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /></p>
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		<title>By: रवि</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/321#comment-7453</link>
		<dc:creator>रवि</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 28 Mar 2008 08:40:44 +0000</pubDate>
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		<description>यू आर रीयली क्रेज़ी! अब जरा विस्तार से बताएं कि आपने पुराने पर्मालिंक के हिसाब से आर्काइव पर कैसे खोजा और कैसे, कहां माल मसाला मिला. कभी दुश्वारी में फंसे तो याद रखें व काम आवे!

क्या कहें, साधुवाद भी कम है. :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>यू आर रीयली क्रेज़ी! अब जरा विस्तार से बताएं कि आपने पुराने पर्मालिंक के हिसाब से आर्काइव पर कैसे खोजा और कैसे, कहां माल मसाला मिला. कभी दुश्वारी में फंसे तो याद रखें व काम आवे!</p>
<p>क्या कहें, साधुवाद भी कम है. <img src='http://nuktachini.debashish.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /></p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Debashish</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/321#comment-7452</link>
		<dc:creator>Debashish</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 28 Mar 2008 07:08:44 +0000</pubDate>
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		<description>शुक्रिया! इत्ती बड़ी पोस्ट और बड़े अंक पर आप दोनों ने टिप्पणी में शब्दों की बड़ी कंजूसी की लेकिन ;)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शुक्रिया! इत्ती बड़ी पोस्ट और बड़े अंक पर आप दोनों ने टिप्पणी में शब्दों की बड़ी कंजूसी की लेकिन <img src='http://nuktachini.debashish.com/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' /></p>
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		<title>By: मीनाक्षी धंवंतरि</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/321#comment-7451</link>
		<dc:creator>मीनाक्षी धंवंतरि</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 28 Mar 2008 07:02:23 +0000</pubDate>
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		<description>हमारी भी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हमारी भी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.</p>
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		<title>By: संजय बेंगाणी</title>
		<link>http://nuktachini.debashish.com/321#comment-7450</link>
		<dc:creator>संजय बेंगाणी</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 28 Mar 2008 06:19:23 +0000</pubDate>
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		<description>शुभकामनाएँ....</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शुभकामनाएँ&#8230;.</p>
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