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बॉलीवुड और चोरी की प्रेरणा

By • Apr 8th, 2004 • Category: रुपहली दुनिया, अतिथि का चिट्ठा

मेहमान का चिट्ठा: हेमन्त

विगत दिनों जब बार्बरा टेलर ने सहारा टीवी के धारावाहिक करिश्मा को कॉपीराईट उल्लंघन के आधार पर बंद करवाने की धमकी दी थी तो बॉलीवुड में सपने बुनने के कारखाने को तो जैसे साँप सूँघ गया था। हालाँकि बाद में बार्बरा मान‍ मनोव्वल से बस में कर ली गईं पर इस घटना से बॉलीवुड की कई हस्तियों की कई रातों ओर दिनों की नींद जरूर हराम हो गई होगी। इस घटनाक्रम से न केवल बॉलीवुड की चोरी की आदतों का भंडाफोड़ हुआ वरन् इससे दुसरी “आधार सामग्री” पर उनकी पूर्ण निर्भरता और हॉलीवुड से जुड़ी अदृश्य नाभिरज्जू का खुलासा हो गया। यह निंदनीय प्रवृत्ति बॉलीवुड में सर्वव्याप्त क्यों है? मेरा मानना है कि इसके बीज काफी पहले बो दिए गये थे।

बॉलीवुड का जन्म उसके नाम की तरह हॉलीवुड की कोख से हुआ है। उसकी शुरुआत चलचित्र और बोलती फिल्मों के अविष्कार के लगभग बाद ही हुई। उन दिनों यह आम बात थी कि निर्देशक या निर्माता या अभिनेता ‍(या सभी) अंग्रेज़ या अमरीकी हों। उस समय के कई विशिष्ट भारतीय निर्देशकों ने इस कला में महारत हासिल करने के लिए विदेश में प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। (दादासाहेब फाल्के भी 1910 में बनी “द लाईफ आफ क्राईस्ट” से प्रेरित हुए थे जो उन्होंने बम्बई में देखी थी।) इससे पश्चिम का प्रभाव अवश्यम्भावी रूप से पड़ा। दरअसल हमने इस पश्चिमी प्रभाव से शुरुआती दौर में काफी कुछ सिखा है और आज जो भी हम हैं (कुछ क्षेत्रों में) उसका बहुत सा श्रेय इसको जाता है। दुर्भाग्यवश, भारत के लिये (आपके नजरिये पर निर्भर है) इन बाहरी तत्वों का दिया सहारा या नियंत्रण भारतीय सिनेमा की आत्मा में गहरा समा गया प्रतीत होता है।

राजकपूर सदृश शोमैन भी पीछे नहीं रहे। अपने चार्ली चैपलिन नुमा खानाबदोश किरदारों के द्वारा उन्होंने दर्शकों का दिल जीतने की ठान ली। यह काम कर गया, और वो अकेले नहीं थे। इस प्रारंभिक व्याख्या का हुबहू खाका प्रयोग कर दूसरे फिल्म निर्माताओं ने भी सफलता हासिल की। बॉलीवुड की स्थिती उसकी व्यथा है। बम्बई में होते हुए इस उद्योग को गैर व्यवसायिक तौर पर चलाया जा सकता है भला! जाहिर है, यहाँ चलचित्र को संचार के नहीं निवेश के माध्यम के रूप में देखा जाता है।

भारतीय दर्शक वर्ग दूसरों से काफी भिन्न है; बस उनका पैसा वसूल होना चाहिए। एक कठिन और थकानेवाले दिन के उपरांत उन्हें शुद्ध मनोरंजन चाहिए, सामाजिक समस्याओं पर कोई पाठ नहीं। नतीजन, भारतीय सिनेमा की मुख्यधारा जल्दी ही फार्मूला फिल्में बनाने तक सिमट गई। जो भी चलचित्र इस प्रथा को तोड़ता उसे “कला सिनेमा” करार दे कर बड़े शहरों और दूरदर्शन पर रविवार दोपहर के प्रसारण समय तक सीमित कर दिया जाता। हैरत की बात नहीं कि बॉलीवुड के फिल्मकारों की पुश्तें निर्माताओं के एक ही उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसके हाथ की कठपुतलियां बनती रही हैं, बॉक्स आफिस पर सफलता। “सड़क” से “जिस्म” तक, निर्देशकों को लगता है कि उनके पास “हिट” बनाने का सीधा जवाब मौजूद है। किसी सफल हॉलीवुड चलचित्र का हिन्दी पुर्ननिर्माण कर इक्का दुक्का जगह बदलाव कर दिया और तैयार हो गई एक “प्रेरित” पटकथा। क़ैद नाज़मी ने द वीक में अपने लेख बॉलीवुड कॉपीकैट्स में पटकथा लेखक की दुःखद दास्तान का ब्यौरा दिया है। कोई चलचित्र उद्योग जो अपने पटकथा लेखकों के साथ इतना बुरा बर्ताव करता हो वह भला स्वस्थ प्रवृत्ति या मौलिकता की डींग कैसे मार सकता है? पर ये भी मानना होगा कि सिनेमा निर्माण करने वाले हर देश ने हॉलीवुड के रद्दी फार्मुला का अनुसरण करने का प्रयास किया है। ऐसे में सिर्फ बॉलीवुड पर क्यों ऊँगली उठाई जाए?

इसके विपरीत कि भारत (और काफी हद तक बॉलीवुड) रिकॉर्ड संख्या में फिल्मों का निर्माण करता है, हमने हॉलीवुड (या विश्व सिनेमा) पर शायद ही कोई असर डाला होगा। नजर डालें 1960 की फ्रांसिसी नई लहर पर (जिसने हॉलीवुड के सिनेमा निर्माण में क्रांति ला दी) या इतालवी नवीन वास्तविकता वादी सिनेमा पर या जापानी कला-कौशल युक्त सिनेमा (स्टार वार्स कुरुसावा की समुराई चलचित्रों से प्रभावित हुआ था) अथवा चीन और हांगकांग के कुंग फू चलचित्र। बॉलीवुड ने क्या बदला है? कुछ नहीं। हमारे लिए यह एक‍ तरफा रास्ता रहा है।

अगरचे कोलकाता उच्च न्यायालय ने बार्बरा की अर्जी खारिज न कर कोई दृष्टांत पेश किया होता तो हो सकता है कि बॉलीवुड की नींद खुलती और सबक सीखा होता। उसके बिना बॉलीवुड बस इसी विश्वास पर आगे बढ़ता रहेगा कि हॉलीवुड तो है ही “प्रेरणा” प्राप्त करने के लिए।

हेमंत कुमारइस पखवाड़े के मेरे मेहमान हेमन्त कुमार फिल्मों के दीवाने हैं। यहाँ तक कि वे रिर्जवॉयर डॉग्स के पात्र एडी कि तरह “नाईस गाई” कहलाना पसंद करते हैं। मूलतः मद्रास निवासी हेमन्त भारतीय और हॉलीवुड पर पैनी नज़र रखते हैं और हर तिमाही अपना ब्लॉग टेम्पलेट जरूर बदलते हैं (मज़ाक कर रहा हुँ यार)। अपने मुख्य चिट्ठे के अलावा हेमन्त तमिल सिनेमा पर खास चर्चा अपने अन्य ब्लॉग टीकाड़ा में करते हैं।

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