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एप्रिल फूल बनाया, बड़ा मज़ा आया

By • Apr 1st, 2007 • Category: ज़िंदगी आनलाईन

शनिवार शाम को अचनक सूझी कि पहली अप्रेल का कुछ मज़ा क्यों न लिया जाय। शशि को फोन लगाया और आइडिया बताया कि क्यों न एनडीटीवी से जुड़े अनुमानों को ही सच कर दिखाया जाय। तय हुआ कि फर्ज़ी साईट मैं बना लुंगा और मसौदा शशि भेज देंगे। रात को शशि की मेल न दिखी तो प्लान बना कि साईट की इमेज भर दी जाय, पूरा मसाला बनाने में समय लगता अतः एनडीटीवी ब्लॉग्स एंड स्पेसेस की मौजूदा साईट के आधार पर ही बनाई गई झूठी साईट। और इसी से जन्म हुआ मूर्ख दिवस के अवसर पर प्रकाशित सनसनीखेज़ खबर का “साइबर मुहल्ला से जाहिर एनडीटीवी का छुपा अजेंडा“, विवादास्पद खबर के पूरे गुरों के साथ, ग़लत URL के बारे में गच्चा ये दिया गया कि साईट शायद अब हटा दी गई है। रात डेढ़ बजे अनूप को पहली बार कड़ी भेजी और उन्हें शरारत की भनक भी न लगी, पर झांसे में पूरी तरह आ गये तरुण ने टिप्पणी की “अचानक पत्रकारों और रिपोर्टरों की बाढ़ हिंदी ब्लॉगिंग में आने में कुछ राज तो जरूर था…शक मजबूत हुआ मोहल्ले के कंट्रोवर्सियल लेखों से”।

अफ़लातून जी ने मुझे चैट पर कहा कि अगर टिप्पणियाँ रोक लेते तो मज़ा और आता पर मज़े की बात ये कि टिप्पणियों में समीर ने काफी पहले ही चोरी पकड़ ली इस के बावजूद लोग भ्रम में रहे ऐसा लगता तो है, शायद मेरी प्रतिटिप्पणी न होने के कारण। रमण एहतियातन बोले, “आप का इन्वेस्टिगेटिव ब्लॉगिंग धमाकेदार है…यदि यह खबर सही हुई तो मैं ने जो तिर्यकविचारक के रवि भाई को अविनाश से जोड़ने के विरोध में जो टिप्पणी की थी, वह वापस लेनी पड़ेगी।” शैलेष की टिप्पणी ने गंभीरता की हदें पार कर दीं या फिर वे हमारे ही मज़े ले रहे थे पता नहीं चल सका, बोले “अब सब साफ़ हो चुका है कि यह सब एनडीटीवी वालों की चाल है।”। प्रतीक ने मामला साफ हो जाने पर भी अपनी टिप्पणी से बासी कड़ी में उबाल फिर लाने की सोची और सफल भी हुये क्योंकि सृजन ने शायद झूठी खबर के परिप्रेक्ष्य में ही टिप्पणी में लिखा, “एनडीटीवी में पक रही इस खिचड़ी के बारे में मुझे कोई भनक तो नहीं थी, लेकिन इस तरह का शक हमेशा से रहा है और इसे देबू दा भी जानते हैं।”

बहरहाल मित्रो ये है अप्रेल फ़ूल प्रकरण का पटाक्षेप, एनडीटीवी के हिन्दी ब्लॉग पोर्टल की ख़बर सरासर गप्प है। और हाँ सारे मामले में मौज लेने के लिये अविनाश का दिली शुक्रिया।

वैसे गूगल के वाया गुसलखाने मुफ्त ब्रॉडबैंड के होक्स पर मेरी दूसरी गप्प पोस्ट ने भी खासा कमाल दिखाया है। शायद किसी को उम्मीद न थी कि एक ही दिन एक ही ब्लॉग पर दूसरी ऐसी पोस्ट भी हो सकती है। अफलातून जी चिंतित हो उठे, “फोन कम्पनियाँ जो अब तक सेवा देती थीं, क्या करेंगी?”, जगदीश संजय के संकेतों के बावजूद अमित भी लपेटे में आ गये, बेहद संजीदगी से लिखा, “भाया, मैं नहीं मानता कि गूगल ऐसे ही ब्रॉडबैन्ड इंटरनेट सुविधा सबको फोकट में दे देगा, इसमें अवश्य कुछ राज़ है।” रमण को लगा कि इस दफा मैं खुद ही अप्रेल फूल बन गया।

मूर्ख दिवस के सिद्धातों के अनुसार भईयै अपन ने संकेत काफी छोड़े थे, एनडीटीवी वाले चिट्ठे में अगर आप चित्र के बड़े आकार को देखने के लिये क्लिक करते तो फ्लिकर पर “फ़ूल खिले हैं गुलशन गुलशन” का टैग देख कर घंटी ज़रूर बजनी चाहिये थी। गूगल वाले मामले में तो खैर उनकी साईट पर जाते ही मामला साफ हो जाता पर “जानकारों का मानना है कि ये निश्चित ही एक प्रलयंकारी परिवर्तक प्रणाली सिद्ध होगी। पानी से नुकसान बचाने के लिये इसे वेक्यूम सील भी किया गया है” जैसे वाक्यों में संकेतों की गंध छोड़ी ज़रूर गई थी। बहरहाल मज़ेदार पोस्ट रहें ये, याद रहने वाले।

हिन्दी चिट्ठाजगत में आज की अन्य हरकतों के बारे में तो आपको पता ही होगा, बेंगाणी बंधुओं द्वरा प्रायोजित नारद के नकली हैकिंग का और दिन भर दिखते बुश के चित्र का और सागर की खबर जिसमें कड़ी देकर उन्होंने अपनी पोल काफी हद तक खोल ही दी। और इनके अलावा एनडीटीवी गप्प के और मज़े लेते हुये अनूप ने भी एक बेहद मनोरंजक पोस्ट लिखी जिसे पढ़ते पढ़ते आप को आँखें पोंछना और पेट पकड़ना तो पड़ेगा ही।

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9 टिप्पणीयाँ »

  1. हमने अगर वो पोस्ट १ को पढी होती तो शायद इतना गच्चा नही खाते लेकिन उस दिन यहाँ ३१ मार्च थी इसलिये अप्रैल फूल का ख्याल तक नही आया। वैसे भी आपसे इस तरह की पोस्ट की उम्मीद नही के बराबर थी 😉

    लेकिन कई बार झूठ भी सच हो जाता है और अगर अईसा हो गया तो मेरा मतलब अगले साल की अप्रैल तक 😉

    आज तो वैसे भी पता नही चल रहा कौन सच बोल रहा है कौन झूठ, इसलिये अब नारद २ अप्रैल के बाद ही पढेंगे।

  2. दादा, सबसे मुश्किल तो मेरे साथ थी… इस ख़बर की सच्चाई में आपका साझेदार होते हुए भी मुझे चुप रहना पड़ रहा था, पेट में मरोड़ पड़ रहे थे। खैर आज का दिन यादगार रहा… आपका आइडिया न सिर्फ शानदार रहा बल्कि बेहद रचनात्मक भी रहा। वैसे… अपनी टिप्पणी में अविनाश खुल के मजे लेते नहीं दीख रहे थे, क्यों भाई… कहीं चोरी तो नहीं पकड़ी गई? 😉

  3. वैसे गूगल के वाया गुसलखाने मुफ्त ब्रॉडबैंड के होक्स पर मेरी दूसरी गप्प पोस्ट ने भी खासा कमाल दिखाया है। शायद किसी को उम्मीद न थी कि एक ही दिन एक ही ब्लॉग पर दूसरी ऐसी पोस्ट भी हो सकती है। अफलातून जी चिंतित हो उठे, “फोन कम्पनियाँ जो अब तक सेवा देती थीं , क्या करेंगी?”

    मेरी चिन्ता ऐसे प्रकट हुई : Chat with अनूप शुक्ला
    अनूप शुक्ला
    show details 18:52 (5 hours ago)

    18:52 me: देबाशीष ने शाम को भी एक भिड़ा दिया ।
    अनूप: haan
    आपकी दूसरी पोस्ट अगर अंग्रेजी में होती तो आपके बताये तरीके से कम से कम नौ जगह और होती । अंतर्राष्ट्रीय मजाक को हिन्दी-प्रेमियों के मनोरंजन के लिए इस्तेमाल सर्वथा उचित है ।

  4. बहुत बढ़िया देबु भाई. मजेदार आयोजन रहा. 🙂

  5. हाय तुमने हमको बेवकूफ़ बनाया था! हम तो इसे सच समझे थे। 🙂

  6. 🙂 🙂 🙂

  7. देबूदा अगली बार सचकी साइट बना कर साइट का स्क्रिन सोट लें, आखिर युनिकोड मंगल फोंट तथा कृतिदेव फोंट में फर्क होता है. 🙂

    कल मज आया लेकिन. 🙂

  8. हा 😀 मज़ा आया

  9. बहुत खूब, अगली बार उम्मीद है और धांसू चीज मिलेगी। एक बार आपकी पोस्ट पढ़कर मैं भी कन्फ्यूजिया गया कि ये सच है और लिखने वाला था कि साइट बनाने का सबको हक है। लेकिन फिर दिमाग ने घंटी बजाई कि देबु दा सिर्फ साइट बनाने के कारण ये सब नहीं लिख सकते।

    बहरहाल जो भी अप्रैल फूल पोस्ट एक बार चक्कर में डाल दे उसे सफल माना जाना चाहिए। फिर आपकी पोस्ट ने तो सबको घुमा दिया।