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चिट्ठों में साँस ले रही है देवभाषा

By • Mar 16th, 2008 • Category: ज़िंदगी आनलाईन

Sanskritपाठ्य पुस्तकों तक सिमट गई देवों की भाषा संस्कृत को अब जाल पर प्रतिष्ठा दिलाने का बीड़ा अमरीकी विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत भारतीय मूल के कुछ छात्रों ने उठाया है। उनका एक वृहत काम है संस्कृत पत्रिका विश्ववाणी जिसमें वे विविध विषयों पर लेख प्रकाशित करते हैं। प्राचीन भारतीय गणित से लेकर विवेकानंद पर आलेख, सुभाषित, यात्रा वृत्तांत और यहाँ तक की संस्कृत क्रॉसवर्ड पज़ल भी। यह पत्रिका शायद अंतर्जाल पर अपने तरह की एकमात्र पत्रिका है। इसका संपादन सौम्या जोयेसा और अविनाश वर्ण करते हैं।

नुक्ताचीनी पर संस्कृत के पहले ब्लॉग की चर्चा किये तो काफी अर्सा गुज़र गया है। संस्कृत चिट्ठों की बात वही दब कर रह गई थी। पर इस समूह ने संस्कृत में अनेक चिट्ठों की भी रचना की है। मसलन “कालीदास“, सियेटल स्थित सॉफ्टवेयर इंजिनियर अजीत कृष्णन का ब्लॉग है, तो “लर्न संस्कृत” में आस्ट्रेलिया के हिमांशु पोटा इस भाषा को गीतों, व्याकरण, शब्द और सुभाषित के ज़रिये सिखाते हैं। अजीत समकालीन विषयों पर संस्कृत में लिखने की योजना पर भी काम कर रहे हैं। इन सभी को जोड़ने वाली कड़ी है संस्कृत भारती नामक संस्था जो गत दस वर्षों से जाल पर संस्कृत के प्रचार में लगी है।

संस्कृत के कुछ चिट्ठे निम्नलिखित हैं

विस्तृत सूची के लिये यहाँ देखें

हालांकि कुछ चिट्ठों से पता चलता है कि यह समूह हिन्दी चिट्ठाकारों के बारे में जानकारी रखता है पर ये हिन्दी ब्लॉगरों से जुड़े क्यों नहीं है यह आश्चर्य का विषय है। उम्मीद है यह पोस्ट कड़ी बनेगी संस्कृत और हिन्दी चिट्ठाकारों के बीच। [स्रोत]

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10 टिप्पणीयाँ »

  1. सुन्दर जानकारी दी है

  2. बढि़या जानकारी है..

  3. जहां हिंदी को अपना स्थान पाने के लिये इतना संघर्ष करना पढ़ रहा हो वहां संस्कृत को देख कर अच्छा लगा।

  4. बढिया जानकारी दी है।आभार।

  5. devbhasha.com पर कुछ बेहतर करने की सोच रहा हूं देखिए क्या बनता है.

  6. बेहद प्रसन्नता हो रही है. जानकारी के लिए साधूवाद.

  7. बढ़िया जानकारी है। बढ़िया काम कर रहे हैं लोग, बधाई।

  8. संस्कृत के पहले ब्लॉग के लिंक पर उत्सुकता में गया तो, निराशा हाथ लगी कि वहां तो, सालों से कुछ भी नया नहीं है।

  9. अच्छा है आख़िर हम अपनी भाषाओं की तरफ लौट रहे हैं.

  10. अंतर्जाल पर संस्कृत निस्संशयेन एक सुखद और रोमांचक स्थिति है , किंतु प्रत्येक भाषा एक जीवन-दर्शन से विकसित होकर पुनः उस जीवन-दर्शन को समृद्ध करती है यह एक सामानांतर प्रक्रिया हैI अत्याधुनिक तकनीक पर भाषा को ले आने का साधुवाद ! पर मेरे मित्र उस जीवन का क्या होगा ???