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अब इंटरनेट ही आपका बुद्धु बक्सा भी

By • Feb 4th, 2007 • Category: ज़िंदगी आनलाईन

भारतीय अर्थव्यवस्था उबाल पर है और फील गुड फैक्टर राजनैतिक विज्ञापनों से निकल हमारे जीवन में ही क्या इंटरनेट पर भी उतर चुकी है, वह भी वेब २ उन्माद की छौंक के साथ। यूट्यूब का देसी संस्करण बनने के इच्छुक तेरा विडियो, तुम ट्यूब और मेरा विडियो के बाद अब बारी है हाल ही में प्रारंभ नये विडियो शेयरिंग जालस्थल आपका विडियो की।

विडियो साझा करने के जालस्थलों के साथ दिक्कत यह है कि हर कोई चाहता है कि ये ईमेल फारवर्ड्स की तरह संक्षिप्त और मज़ेदार हों। विडियो कि ज़बान में यह ज़रुरत “उत्तेजना” तक सिमट जाती है। आप ऐसे जालस्थलों के मुखपृष्ठ पर सरसरी से नज़र डालें, आपको तुरंत अपने आस पास देखने की इच्छा होगी, “कहीं कोई देख तो नहीं रहा”। ये स्थल परिवार के साथ देखने लायक तो फिलहाल है ही नहीं। पर क्या करें, वेब २.० की मूल परिकल्पना ही यूज़र जनरेटेड केंटे्ट की है, यानि प्रयोक्ता व्यंजन पकायें और रेस्तरां आप चलायें।

आपका विडियो की टैगलाईन है “डायरेक्टर बन जाओ”, अनोखा भले न हो पर मंतव्य बड़ा पवित्र लागे है। शायद उनके ज़ेहन में लगातार बढ़ते रिकार्डिंग टाईम और बढ़िया विडियो गुणवत्ता वाले कैमरा युक्त वो ढेर सारे यप्पी और भड़कीले सेल फोन रहे हों जो आजकल लोग मयखाने से लेकर पैखाने तक साथ लिये घुमते हैं। नोकिया ने तो ऐसे कैमरों से निर्मित फिल्मों को एक विधा का ही दर्जा दे रखा है। तो भैया बाज़ार तो है, और जब तक यह क्रिटिकल मास नहीं छू पाता तब तक आपको बॉलीवुड फिल्मों से उत्तेजक दृश्यों और फिरंग विज्ञापनों से ही संतोष करना होगा। आपका विडियो के मन मुताबिक करण जौहर और मणि रत्नम न सही आपको ढेरों जगमोहन मूंदड़ा ज़रुर मिल जायेंगे।

आपका विडियोएक बात जो मुझे किसी भी जालस्थल के प्रति उत्साहित करती है और उनके लंबी रेस में टिके रहने का आश्वासन देती है वो है कमाई के ज़रिये। आपका विडियो पर “स्पेशल” सेग्मेंट में यह संभावना दिखती है। इसे मूवी आन डिमांड जैसी परियोजनाओं से जोड़ कर देखें तो विश्वास हो जायेगा कि भविष्य उज्जवल है। आपका विडियो का कलेवर बढ़िया है, चुंकि यह अभी बीटा में ही है तो सुधार की अपार गुंजाईशें हैं ही, मसलन यह बात पहले ही कई लोग लिख चुके हैं कि विडियो फायरफॉक्स पर काम नहीं करते। विडियो बड़ा कर देखने की भी बात समझ नहीं आती, अगर दृश्य का वास्तविक स्क्रीन रेज़ोल्यूशन ही कम हो तो क्या लाभ। एक अच्छी बात यह कि यहाँ अनेक विडियो प्रारूप की फाईलें अपलोड की जा सकती हैं, १०० एम.बी आकार तक। और किसी जावा वाले के लिये क्या ब्राउज़र पर “.jsp” एक्सटेंशन देखना कम खुशी की बात है?

मुझे तो वाकई उस दिन का इंतज़ार है जब ऐसे जालस्थलों का कुछ काम का रूख भी सामने आये, मनोरंजन से हटकर, कल्पना कीजीये ब्रेंकिग खबर के साथ किसी सिटीज़न जर्नलिस्ट की विडियो रपट, साक्षात्कार और तकनीकी कार्यक्रमों की। शायद उन्हें कुछ आभास भी है इसका क्योंकि आप वहाँ “टैकज़ोन” और “न्यूज़ एंड ब्लॉग्स” जैसी श्रेणियाँ देख सकते हैं जिनमें भविष्य में शायद कुछ सामग्री जोड़ी जा सके।

और विडीयो स्थलों के बढ़ते प्रचलन के बीच जिस उभरते तथ्य को साफ महसूस किया जा सकता है वो है टेलीविज़न के आपके बुद्धु बक्से से आपके कंप्यूटर पर पदार्पण का। इंटरनेट पर टीवी और आईपीटीवी की बात तो कई सालों से की जाती रही है। याहू, गूगल, माईक्रोसॉफ्ट जैसे दिग्गज और अनेकों दूरसंचार कंपनियाँ जाल पर डिजीटल सामग्री के प्रसार में जुटी हैं, प्रयोक्ता से इंटरेक्टिविटी बढ़ाकर आय की अनंत संभावनायें के चलते यह एक प्रबल माध्यम बन कर उभर रहा है। हालांकि अधिकांश भारतियों के लिये शायद यह अब भी मुंगेरीलाल के ख्वाब हैं, बैंडविड्ट्थ अब भी एक समस्या है, इसकी पहुँच बढ़ रही है पर कीमतें किसी भी लिहाज़ से वाजिब नहीं। एक और सवाल है प्रयोक्ता द्वारा भेजी जा रही सामग्री पर नियंत्रण का। कॉपीराईट व पायरेसी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जिन पर नैपस्टर से लेकर हाल ही में यूट्यूब तक को कटघरे में खींचा जा चुका है।

तो ऐसे जालस्थलों के लिये सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि स्पाइवेयर व वायरस से सुरक्षा और कॉपीराईट जैसे मुद्दों का ध्यान रखते हुये उच्च गुणवत्ता की विडियो सामग्री इंतरनेट पर उपलब्ध करा सकें। अगर यह हो सका तो टीवी और इंटरनेट दोनों की ही बल्ले बल्ले है।

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4 टिप्पणीयाँ »

  1. ज्ञानवर्धक आलेख.. अंतर्जाल पर यूट्यूब जैसी साइटों का प्रयोग और ब्लॉगिंग करते हुए अपनी भावनाओं-विचारों को अभिव्यक्ति दे रहे आम आदमी को इस साल टाइम ने मेन ऑफ़ द ईयर से नवाज़ा है..ऐसे में बढ़ती भीड़ को आकर्षित करने के लिए कई नए दावेदार सामने आएंगे.. आपने इतनी रिसर्च करने में घंटों लगाए होंगे.. हम मिनटो में किनारे हो गए. लेख के लिए धन्यवाद, देबाशीष जी.

  2. कॉपीराइट को सख़्ती से लागू करने से वीडियो साझेदारी वाली साइटों की हवा निकल सकती है. लेकिन ऐसा हुआ तो भीड़ घटेगी, और इस कारण क्रिएटिव लोगों को अपेक्षाकृत बड़ा मंच उपलब्ध हो सकेगा. लेकिन लगता नहीं कि कॉपीराइट को पूरी तरह लागू कर पाना कभी संभव हो पाएगा.

  3. अच्छा आलेख.

  4. वाह बहुत ही उम्दा लेख !