नुक्ताचीनी ~ Hindi Blog


एक महाब्लॉगर से मुलाकात

By • May 26th, 2006 • Category: व्यक्तिगत

कुछ दिन पहले अनूप का ईमेल आया, बोले जिन किताबों को भेंट करने का वायदा किया था वो देने स्वयं आ रहा हूँ। ज़ाहिर है जिन चिट्ठा मित्र से अब तक केवल फोन पर बातचीत हुई या फिर चित्रों में ही जिन्हें देखा हो उनसे मिलने की बात पर मन उत्साहित तो था ही, पर बड़भैया से मुलाकात के पहले थोड़ा सहमा भी था। जीवन और साहित्य के निचोड़ से ओतप्रोत उनके लेख तो कई मर्तबा इस तुच्छ बुद्धि के सर से चार इंच उपर ही तिरते रह जाते हैं, उन पर टिप्पणी करने का माद्दा हमेशा नहीं जुट पाता, अब भई जिनके ब्लॉग पर टिप्पणी करने पर भी डर लगता हो और जिनकी हल्की डपट से अतुल अपनी पोस्ट हटा देते हों, ऐसे महाब्लॉगर से मिलने के लिये थोड़ा साहस तो जुटाना ही पड़ता है। पर जब मुलाकात हुई तो अपेक्षा से भी अधिक मन को भा गये अनूप। दो दिनों में कई बार भेंट हुई और वस्तुतः अनूप ने मेजबान की ही जम कर मेहमान नवाज़ी कर डाली।

Anup and Debu at the AFK Guesthouse, Puneअनूप कल अलसुबह पुणे पहूँचे थे पर तरोताज़ा होते ही फुनिया कर गेस्टहाउस बुलवा लिया। पहली मुलाकात में छूटते ही थमा दी आधा गाँव और राग दरबारी, फिर चल पड़ी चर्चा। जिस होटल में प्रशिक्षण कार्यक्रम चल रहा था मेरे आफिस के पास ही था सो गये भी साथ। शाम को अनूप से फिर वहीं मुलाकात हुई। बैठने की जगह की दरकार थी तो सोहराब हॉल में एक महंगी से जगह पहुँच गये। अनूप को बतियाना और चाय दोनों पसंद है, लिहाजा वही चाय ही मंगाई गई। मेनु में चाय की कीमत देख अनूप और मैं दोनों मुस्करा दिये। ऐसे ही सरल और सीधे हैं अनूप। स्पष्टवक्ता, समझदार और निष्कपट। अपने पसंदीदा लेखकों के लेखन के परागकण अनूप के मानस पर प्रचुरता से समा गये हैं। जीवन को भी नये नज़रिये से देखते हैं अब। “पहले नहीं, पर अब इनके लेखन का सत्व समझ पाता हूँ”, अनूप कहते हैं। जब वे हरिशंकर परसाई या मनोहर श्याम जोशी के शिल्प की बात करते हैं तो टकटकी बाँधे सुनते रहने के सिवा मन कुछ और नहीं कर पाता। जब वे राग दरबारी के स्मरित अंश धाराप्रवाह सुनाते हैं तो हंसी पर ब्रेक नहीं लगता।

पढ़ने के शौकीन अनूप सफर का आन्नद भी इसी को मानते हैं, इसलिये वायुयान से आना अखर रहा था। फिर भी हवाईअड्डे पर जो समय चुरा पाये तो विजय तिवारी की हरसूद पर लिखी पुस्तक तकरीबन ख़त्म कर डाली। और साथ ही अपना दूसरा चस्का भी पूरा कर लिया, ब्लॉगिंग का। अनूप न केवल लिखते हैं वरन पढ़ते भी बहुत है। मेरे यह बताने से कई पाठक जो चिट्ठाकारी भी करते हैं निश्चित ही खुश होंगे कि अनूप लगभग दिन की सभी पोस्ट पढ़ते हैं, उनके हर पोस्ट पर मौके दर मौके आप जो कड़ियाँ विभिन्न ब्लॉग पोस्टों की देखते हैं वे सबूत हैं कि वे सरसरी तौर पर नहीं, ध्यान से पढ़ते हैं। और पढ़ा याद भी रखते हैं। यही स्मृति उनको बरसों पुरानी घटनाओं के संस्मरण लिखने में सहायता भी करती है। और लगगभ इतना ही चमत्कारी है उनका ब्लॉग मित्रमंडल। वे संबंध केवल कमेंटियाने या पढ़ने तक सीमित नहीं रखते और मेरे ख्याल से यह जानने के लिये फुरसतिया की किसी भी पोस्ट पर आई टिप्पणियों का विस्तार देख लेना ही काफी है। मित्रता करना और किताबों में गुलाब की पंखुड़ी की तरह उसे संजोये रखने में माहिर है अनूप।

अनूप ने भेंट की गई पुस्तक पर लिखा है, “प्रिय देबाशीष को लिखाई पढ़ाई जारी रखने और जीवन के हर क्षेत्र में निरंतर प्रगति की मगलाकामनाओं के साथ”। मौका अच्छा था तो मैंने किसी सधे प्रकाशक की तरह अनूप से निरंतर की वापसी का वायदा भी ले लिया। ये पुस्तकें मेरे लिये खास मायने रखती हैं। बरसों बाद मुझे फिर किसी ने पुस्तक भेंट में दी हैं, मन गदगद है।

आज शाम को मुलाकात के बाद जब अनूप की पुणे से रवानगी का वक्त आया तो शहर के आसमान पर बदली घिर आई थी। रात नौ बजे जब अनूप दिल्ली की फ्लाईट पकड़ रहे थे तब शायद मेरे मन की तरह ये बादल भी मायूस थे। और थोड़ी देर में वे सुबक भी पड़े। मौसम में थोड़ी ठंडक आ गई पर अनूप के साथ इस सार्थक भेंट की उष्मा मन में सदा बनी रहेगी।

[इस ब्लॉगर मीट के अन्य चित्र अनूप ने यहाँ पोस्ट किये हैं।]

 

13 टिप्पणीयाँ »

  1. देबू दा

    बहुत सही। अनूप भाई को चिट्ठी लिखता हूँ कि दादा इधर कब आ रहे हो।

    पंकज

  2. अभी-अभी आया दिल्ली तो देखी यह पोस्ट। बहाने से जो ‘बुराई-खिंचाई’उसका हिसाब-किताब कानपुर से चुकाया जायेगा। अतुल को डपटने की बात लिखकर हमें अतुल से डटवाना चाहते हो? हमने डाटा थोड़ी था, कहा भी था कि लिखो यार! बकिया पंकज भाई, कभी आऊंगा अमेरिका भी।

  3. कहने की ज़रूरत नहीं कि अनूप जी के लेख विचारनीय होते हैं. उनकी सक्रियता को देख कर हमारे जैसे ब्लॉगरों को शर्मिंदगी का अहसास होता है…और सप्ताह में एकाध पोस्ट लिखने की कोशिश करनी ही पड़ती है.

  4. अच्छे लोगों का अहसास भर काफी होता है उत्साह, ऊर्जा और चेतना जगाने के लिए.

    आप धन्य हैं जो रूबरू मिले.

    रवि

  5. राग दरबारी की बात ही क्या है ! रुप्पन बाबू हों या बेनी पहलवान सबके प्रसंग याद आते ही होठों पर मुस्कुराहट का आना लाजिमी है ! अनूप जी से मुलाकात को हम सब के साथ बांटने का शुक्रिया!

  6. अरे अनूप जी, दिल्ली आए और मुझसे न मिले, यह तो बहुत नाइंसाफ़ी है जी!! 🙁

  7. फोटो की अनुपलब्धता के कारण इस महाब्लॉगर मीट को आधिकारिकारिक मान्यता नही जी जा सकती। अत: आप लोग भूल सुधार करके फोटो चिपकाए और बधाई का पैकट जो हम छोड़े जा रहे है उसे उठा लें। इस महाब्लॉगरों के मिलन पर हमारी ओर से बहुत बहुत बधाई। ईश्वर करें, अनूप भाई की फ़्री की और वेकेशन (ट्रैनिंग यार) मिलें और वे सभी विभिन्न ब्लॉगरों के शहर में हो, ताकि हर बार ब्लॉगर मीट हो।

    अनूप भाई, (आप एक मीटिंग करके) अपने आफ़िस को इत्तिला कर दीजिए और उन्हे ब्लॉगरों के शहरों की लिस्ट सुविधानुसार प्रदान कर दीजिए। ताकि वो लोग अगली बिजीनेस ट्रिप उस शहर मे रखवा सकें। हम उत्सुकता से अगली ब्लॉगर मीट की प्रतीक्षा करेंगे।

    देबू दा, टिप्पणी टाइपिंग वाले बक्से के फोन्ट थोड़े बड़े कर दो यार, हमे चशमे से भी साफ़ नही दिख रहा।

  8. सभी का धन्यवाद! अनूप से मिलना एक अभूतपूर्व अनुभव रहा। आशा करता हूँ कि वे सभी की इच्छा के अनुरूप भ्रमण और ब्लॉगरमीट के और अवसर पैदा करेंगे।

    जीतूः अनूप के डिजीटल कैमरे में सब चित्र कैद हैं। जल्द ही वे पोस्ट करेंगे। आपके हुक्म के मुताबिक कमेंट के टेक्सटएरिया का फाँट साईज बढ़ा दिया है।

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  10. आप सीनियर चिठा्कारों को विशेष आमंत्रण है कि इस बार अनुगूँज में लिख ही डालिये, भाभी जी के गुस्‍से का ठीकिरा हमारे सर पे फोड़ दीजयेगा

  11. […] फिर मामला आया संपादक मंडल चुनने का। नये जुड़ने वाले लोगों में सुनील दीपक देबाशीष की पहली पसंद थे। आलोक चूँकि अब भारत आ गये थे लिहाजा वे भी हमारी टीम में आ गये। पुराने लोगों में सभी लोग साथ लिये गये। कोई छोड़े जाने लायक नहीं था। नये लोगों में ई-स्वामी को लेने की जिद अतुल की थी। स्वामी के तेवर कुछ ज्यादा ही औघड़ हैं। लिहाजा देबाशीष जैसे संभ्रांत संपादकाचार्य के मन में इनको शामिल करने कुछ स्वाभाविक हिचक थी। लेकिन हमने अपने ‘बड़भैया’ के पद का दुरुपयोग करते हुये स्वामी को घुसा दिया टीम में। […]

  12. चिट्ठाकारी के भीष्म पितामह और महाब्लॉगर की इस भेंट का वर्णन पढ़कर आनंद आ गया।

  13. […] के बाद जिस दाम में पड़ेंगी उतने में आप अपने दोस्त के साथ किसी कायदे के होटल में एक चाय भी शायद […]