बाबू समझो इशारे
By Debashish • Jul 18th, 2007 • Category: आसपासविश्व हिन्दी सम्मेलन अभी अभी समाप्त हुआ है। अभिव्यक्ति पत्रिका में गप्पी की रपट भी छपी है। साथ ही सूचना है दी गई है भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र द्वारा आयोजित डा. होमी भाभा हिंदी विज्ञान लेख प्रतियोगिता-2007 के बारे में जिसके लिए विज्ञान लेख आमंत्रित किये गये हैं। इसके नियमों में एक जगह लिखा है, “इंटरनेट अथवा ईमेल द्वारा कृपया लेख न भेजें”। क्या मंज़र है वाकई! एक ओर न्यूयार्क जैसे आधुनिक शहर में हिन्दी की पताका लहरा कर इसको विश्वव्यापी बनाने के सपने देखे जा रहे हैं और अपने ही देश में हिन्दी को इंटरनेट पर शोभायमान देख प्रस्तर युग के सरकारी बाबू भुनक रहे हैं, बदलते समय के इशारे इनके पल्ले नहीं पड़ते। क्या अगला हिन्दी सम्मेलन इनके लिये भारत में नहीं हो सकता प्लीज़?









भारत मे अमेरिका ब्रितैनी का कहा हमेशा सही मान लिया जाता है,अगर भारत के गांव पर भी खोज करनी हो तो अमूमन आदमी इस काम के लिये भी फ़हली फ़्लाईट पकड कर विदेश चला ही जाता है ज्यादा खून ना जलाये,दो पैग लगाये सो जाये…:)
हा देबाशीश जी आपके निंदक नियरै राखिये पर भी कुछ कहना है,मेल आई डी नही था इसलिये यही कह रहा हू.आपके लिये ..
निंदक नियरै राखिये ,लिखना अगर सुहाय
तो दिल से सौचे आपणै,पर निंदा मे ना जाय”
जरा सोचियेगा… पर निंदा को भी निंदक नियरै राखिये वाले स्वांत सुखाय नही करते है
खाली लिखिये नही आचरण मे भी लाईये,सबसे पहले अपने आचरण मे लाने के बाद ही दूसरे को कहना उचित रहता है,
यार ये सरकारी बाबू!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
कुछ नहीं कहना, इससे अच्छा है दिवार से सर फोड़ लें.
“…विज्ञान लेख आमंत्रित किये गये हैं। इसके नियमों में एक जगह लिखा है, “इंटरनेट अथवा ईमेल द्वारा कृपया लेख न भेजें”…”
अजीब विरोधाभास है! कितना अवैज्ञानिक!
हँसी भी नहीं आती!
वह सब तो ठीक है यह टिप्पड़ियों के साथ फोटो की जगह ——- जैसा क्या है? उसझन हो रही है.
अब टिप्पड़ी कामवाली.
एक आश्रम है रिखिया (देवघर, झारखंड, भारत) में. स्वामी सत्यानंद सरस्वती का. वे भी ई-मेल वगैरह को पूरी तरह से प्रतिबंधित रखते हैं. आप चिट्ठी लिखिए वहां से चिट्ठी से जवाब आ जाएगा. हां, आप फोन कर सकते हैं वो भी समय तय है. पहले मुझे लगता था कि बहुत अवैज्ञानिक है यह सब. फिर लगा जिसने BSY जैसे प्रामाणिक योग विद्यालय रचा हो वह इतना अवैज्ञानिक तो कदापि नहीं हो सकता कि बिना सोचे-समझे ई-मेल को प्रतिबंधित कर दे. लेकिन मैं स्वामीजी के इस कदम की निंदा कदापि नहीं करता. सक्रियता के कई तल और विधाएं हैं. विधाओं में क्यों उलझें, सक्रियता है यही पर्याप्त है.
संजय: बात सक्रियता की नहीं है, रवि ने जैसा कहा, विरोधाभास की है। बार्क भारत की सर्वोत्कृष्ट सरकारी वैज्ञानिक संस्थाओं में से एक है। इनसे उम्मीद रहती है कि ये देश को राह दिखायेंगे। समय के साथ तो हर कोई बदलता है, हम आईटी सुपरपावर बनने की बात कर रहे हैं, बार्क को तो पथ प्रशस्त करना है पर जब ये ही कूंयें के मैढक बने बैठे हैं तो दूसरों से क्या उम्मीद रखें? क्या आप किसी टीवी प्रतियोगिता में पोस्टकार्ड से जवाब मांगते हुये देखते हैं ? बात यहाँ सिर्फ एसएमएस से कमाई की नहीं है, ये वक्त का तकाज़ा है, मोबाईल सुलभ है, पत्र के मुकाबले एसएमएस जल्दी पहुंचेगा, नतीजे स्वचालित रूप से निकाले जा सकते हैं, आदि। अगर ये ईमेल से रचना स्वीकार्य करते तो मैं रमण कौल द्वारा आदित्य सुदर्शन रचित विज्ञान फंतासी कथा के इतनी मेहनत से किये हिन्दी अनुवाद को भेज देता।