क्या इलेक्ट्रिक वाहन मरम्मत के एकाधिकार की ओर बढ़ रहे हैं?
याद है वो दिन जब मोबाइल फोन निर्माता अपनी कमाई बढ़ाने के लिए डिवाइसेज को कैरियर अनुबंधों के साथ लॉक कर दिया करते थे? आज, इलेक्ट्रिक वाहन (EV) बैटरियों का मामला भी कुछ इसी दिशा में बढ़ रहा है। यद्यपि यह मुमकिन है कि कुछ प्रतिबंध वाजिब सुरक्षा चिंताओं के कारण लगाए गए हों, पर यह प्रवृत्ति उपभोक्ता अधिकारों और भारत की चक्रीय अर्थव्यवस्था (circular economy) के लिए एक गंभीर चुनौती पेश कर रही है।
हाल ही में, ईवी बैटरियों की मरम्मत से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा करने वाला यह लेख पढ़ने को मिला, जिसने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा कर दिया है: क्या हम एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ महंगे बैटरी पैक को बदलना एकमात्र विकल्प होगा, भले ही मरम्मत संभव हो?
पुराने और नए का अंतर: क्यों बदल गया परिदृश्य?
ईवी को शुरुआती दिनों में अपनाने वाले, मसलन महिंद्रा e2o के मालिक, भाग्यशाली थे क्योंकि उनकी बैटरी के अलग-अलग सेल को बदलकर मरम्मत करना अपेक्षाकृत आसान था। लेकिन आज के नए ईवी अक्सर सीलबंद बैटरी पैक के साथ आते हैं। ऐसा डिज़ाइन स्वतंत्र मैकेनिकों के लिए इनकी मरम्मत को मुश्किल या असंभव बना देता है।
ईवी बैटरियों की मरम्मत करना मुश्किल है। इसके मुख्यतः दो कारण हैंः
- निर्माता स्पेयर पार्ट्स, डायग्नोस्टिक टूल या मरम्मत करने की जानकारी स्वतंत्र वर्कशॉप को उपलब्ध नहीं करा रहे हैं। इसके कारण वारंटी समाप्त होने के बाद भी, उपभोक्ता अनिवार्य रूप से OEM (मूल उपकरण निर्माता) पर निर्भर हो जाते हैं।
- नई बैटरियों में उन्नत शीतलक प्रणालियाँ, तापमान सेंसर और जटिल प्रबंधन प्रणालियाँ (जैसे कि बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम यानि BMS) होती हैं। इन बैटरियों को सुरक्षित रूप से खोलना और उनकी मरम्मत करना जटिल है, जिसके लिए विशेष प्रशिक्षण और उपकरण की आवश्यकता होती है। इसलिये भी निर्माता अक्सर सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए मरम्मत को हतोत्साहित करते हैं।
पर यह एक बड़ा आर्थिक संकट क्यों है?
भारत जैसा कीमत-संवेदनशील (price sensitive) और विशाल बाज़ार तेज़ी से ईवी को अपना रहा है। यहाँ बैटरी मरम्मत का आसान न होना केवल एक तकनीकी मुद्दा नहीं, बल्कि एक बड़ा आर्थिक और पर्यावरणीय संकट है। इसके कारण निम्न हैं:
- उच्च उपभोक्ता लागत: एक ईवी की बैटरी की कीमत वाहन की कुल लागत का लगभग 40-50% होती है, इसलिये इसको बदलना एक बेहद महंगा विकल्प होता है। अगर हम मरम्मत के माध्यम से बैटरी का जीवनकाल बढ़ा सकें, तो यह सीधे तौर पर आम आदमी की जेब के लिये बेहतर होगा।
- आयात पर निर्भरता: भारत लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भर है। यदि हम पुरानी बैटरियों की मरम्मत नहीं कर पाते और उन्हें जल्द रीसाइक्लिंग (पुनर्चक्रण) के लिए भेज देते हैं, तो नए पैक की लगातार मांग के कारण यह आयात और हमारी विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ता जाएगा। बैटरी की मरम्मत से तत्काल रीसाइक्लिंग की आवश्यकता टल जाती है, जिससे राष्ट्रीय संसाधनों पर बोझ कम होता है।
- चक्रीय अर्थव्यवस्था के लक्ष्य में बाधा: भारत ने 2070 तक नेट-ज़ीरो का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। बैटरी की मरम्मत करने से उसका जीवनकाल बढ़ जाता है, जिससे पर्यावरणीय प्रभाव कम होता है और हम एक सर्कुलर इकोनॉमी की दिशा में कदम बढ़ाते हैं। सीलबंद बैटरी पैक इस मोर्चे पर एक बड़ी चुनौती पैदा करते हैं, जो टिकाऊपन (Sustainability) के हमारे प्रयासों को कमज़ोर करते हैं।
बिल्ली के गले घंटी कौन बांधेगा?
ईवी पर सरकार के जोर के साथ, यह आवश्यक है कि हम इस क्रांति को लंबे समय तक टिकाऊ बनाने के लिए रीसाइक्लिंग और मरम्मत (Right to Repair) के पहलु पर भी विचार करें।
बैटरी की मरम्मत और ‘सेकंड-लाइफ’ अनुप्रयोगों को बढ़ावा देने से, भारत में एक नया कौशल-आधारित रोजगार और सर्विसिंग इकोसिस्टम खड़ा हो सकता है। लेकिन इस सुधार को लागू करने के लिए नियामक हस्तक्षेप की सख्त आवश्यकता है। नीतिगत इच्छाशक्ति ही निर्माताओं को ‘मरम्मत-अनुकूल डिज़ाइन’ (Design-for-Repair) अपनाने के लिए बाध्य कर सकती है, जैसा कि वैश्विक स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में दबाव बनाया जा रहा है।
हमें यह समझना होगा कि एक सफल ईवी क्रांति के लिए, बैटरी पैक को एक ‘ब्लैक बॉक्स’ बने रहने देना अच्छा विकल्प नहीं है। उनके महंगे उत्पाद की मरम्मत की जाए या नहीं यह जानने और यह तय करने का अधिकार केवल उपभोक्ताओं के पास होना चाहिए।
पर इस एकाधिकार को चुनौती देने और भारतीय उपभोक्ताओं को उनका ‘मरम्मत का अधिकार’ दिलाने का जिम्मा लेगा कौन? इसका जवाब ही भारत में ईवी के भविष्य की दिशा तय करेगा।




पाठक उवाच