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भूसंपत्ति की कीमतें : मुख्यधारा का मीडिया अब चेता

By • Feb 14th, 2007 • Category: ब्लॉगिस्म, ज़िंदगी आनलाईन

Real-estate-bubbleअर्थनीति जैसे विषयों में मेरी खास रुचि नहीं रही पर फिर भी इंडियन इकॉनामी ब्लॉग पर नज़र रखता रहा हूँ। गये साल होम लोन लेने के बाद मुझे भूसंपत्ति के बारे में थोड़ी जानकारी बढ़ाने का मौका मिला और लगातार बढ़ती कीमतों और कर्ज़ दरों को लेकर चिंतित भी रहा। इस बीच लोगों से चर्चा भी हुई पर सबसे हैरत की बात यह लगी कि सामान्य तौर पर प्याज़ और आलू के दाम में बढ़त से भी परेशान हो जाने वाले लोग भूसंपत्ति की कीमत बढ़ने से खास चिंतित नहीं लगते थे। ठीक इसके उलट, माँग बढ़ती ही जा रही है और साथ ही कीमतें भी। अख़बारों के एडवर्टोरियल लेखों और विज्ञापनों में माहौल कुछ यूं बनाया जा रहा है मानो कि अपना मकान बनाना सबसे बढ़िया निवेश विकल्प हो। सचाई यह है कि यह बात सरासर ग़लत रही है। तभी मुझे लगा कि हमें इस पर कुछ लिखना चाहिये।

जगदीश भाटिया, जो इन मामलों में सलाहकार भी हैं, ने निरंतर के लिये इस लेख की शुरुवात की। हमने ये लेख दिसंबर में लिखना शुरु किया था और अगर आप ध्यान दे रहे हों तो मुख्यधारा का मीडिया अब जाकर चेता है और हर अख़बार और चैनल पर भूसंपत्ति की आसमान छूती कीमतों, बैंक की असामान्य कर्ज दरों और खरीददारों की तकलीफों की बात हो रही है। यह तब हुआ है जब होम लोन की ब्याज दरें तकरीबन 1 प्रतिशत बढ़ीं हैं, महंगाई में भारी बढ़त देखी जा रही हैं और बैंक भी जमा की बजाय कर्जे की रकम में बढ़त से परेशान है। हमने रीयल एस्टेट कारोबार से जुड़े जिन लोगों से भी बात की वे कीमत की बढ़त को सामान्य ठहराते रहे हैं, अर्थनीति के ज्ञाता इसे बुलबुला कहने को तैयार नहीं क्योंकि वे परिणामों का इंतज़ार कर रहे हैं। हमने बुलबुला शब्द रीयल एस्टेट और स्पेक्यूलेटीव बाजार के धाराशायी होने के अनुमान पर ही नहीं वरन् बेवजह फुलाव की वजह से भी प्रयोग किया। एचडीएफसी के चेयरमैन के हालिया बयान से भी यह आशंका गलत नहीं लगती। इकॉनॉमिस्ट पत्रिका पहले ही भारतीय अर्थव्यवस्था में आते उबाल की ओर आगाह कर चुकी हैं और यह कह चुकी है की चीन से तुलना की बजाय भारत को बढ़त की रफ़्तार पर ध्यान देना होगा, बाघ की बजाय हाथी की चाल श्रेयस्कर होगी।

निरंतर के लेख में एक रोचक बात मुझे लगी वो है ग्लोबल इकॉनामी मैटर्स ब्लॉग के सहलेखक वेंकट की। उन्होंने कहा की दरअसल एक नया उपभोक्ता वर्ग उभर रहा है। मैंने ज़िक्र किया ऐसे उपभोक्ताओं को जो कीमतों और कर्ज़ की दरों से मानों आखें फेरकर अपना मकान का सपना पूरा करने लगे हैं, इनमें एनआरआई निवेशक भी हैं और बेतहाशा कमाते आईटी के कामकाजी दंपत्ति भी। हम सदा परंपरागत उपभोक्ताओं के हिसाब से ही बात करते हैं पर यह नया वर्ग भूसंपत्ति की कीमतों को पूँजीनिवेश न मानकार केवल ई.एम.आई और कर्ज़ के पैमाने पर ही तौलता है। कुछ यही कारण आटोमोबील क्षेत्र में देखा गया जहाँ महँगी गाड़ियाँ, भले कर्ज़ के भरोसे हो, ज़्यादा बिक रही हैं। कुछ ऐसा ही हाल भारतीय रीयल एस्टेट का भी हो चला है, आम पहुँच के मकानों की बनिस्बत डीलक्स व सुपर डीलक्स निर्माण हो रहे हैं। इन सारे तथ्यों पर विचार करने के लिये ये लेख अवश्य पढ़ें और हमें बतायें।

निरंतर मित्र

निरंतर के इस लेख का उल्लेख कर मैं न केवल पाठकों से इसे पढ़ने का अनुरोध करना चाहता था वरन यह भी बताना चाहता था कि किस तरह निरंतर मित्र बन कर जगदीश ने यह लेख तैयार किया और किस तरह उन की मदद से हमारे दल ने ऐसे विषय पर पेशेवर लेख तैयार किया जिस के विषय विशेषज्ञ दल में मौजूद नहीं थे। निरंतर के प्रारंभ से ही हमारी इच्छा थी कि इसमें हिन्दी ब्लॉगजगत के लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल हों। आप में से जो फॉर्मल या औपचारिक लेखन में रुचि रखते हैं, नये विषयों पर राय रखने के साथ साथ रिपोर्टिंग करने के इच्छुक हैं वे सिटिज़न जर्नलिज़्म को नये मायने दे सकते हैं निरंतर मित्र के रूप में हमसे जुड़कर। “निरंतर मित्र” पत्रिका के परोक्ष संवाददाता के रूप में तैनात रहेंगे और समय समय पर संपादक मंडल उनकी सहायता ले सकेगा। आप हमारे लिये लेख लिख सकते हैं या हमें नई कथाओं के सुझाव और लीक्स भेज सकते हैं। हो सकता है आप अपने इलाके, शहर या राज्य से संबंधित कोई आँकड़े, चित्र या पते इकट्ठा कर के दे सकें, किसी का साक्षात्कार ले सके या कोई छोटी रपट बना कर दे सकें। आप अनुवाद, प्रूफ रीडिंग, ग्राफिक्स बनाने में भी मदद कर सकते हैं। निरंतर मित्रों के नाम संबद्ध लेखों के साथ प्रकाशित किये जायेंगे। निरंतर मित्र बनने के लिये आप इसकी मेलिंग लिस्ट में शामिल हो जायें जिससे हम आपस में आसानी से संपर्क कर सकेंगे।

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2 टिप्पणीयाँ »

  1. ठीक एक वर्ष पहले इसी विषय पर मेरे चिट्ठे पर प्रकाशित लेख “कब मिलेगा आवास का मौलिक अधिकार” को राष्ट्रीय सहारा ने 24 फरवरी, 2006 को अपने ‘प्रोपर्टी’ पृष्ठ पर प्रकाशित किया था, जिसमें रीयल इस्टेट की आसमान छूती कीमतों पर विस्तार से चर्चा की गई थी। लिंक निम्नवत है – http://srijanshilpi.com/?p=10

  2. हैरानी की बात यह है कि प्याज और रसोई गैस जैसी छोटी-छोटी चीजों की कीमतें बढ़ने पर तो हंगामा खड़ा हो जाता है और सरकारें डगमगाने लगती हैं, लेकिन रीयल इस्टेट के बाजार में आए इस अनियंत्रित उछाल को लेकर कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं हो रही है।

    बहुत बढ़िया लेख है सृजन आपका, मुझे ज्ञात होता तो जगदीश के साथ आप ये लेख लिखने के हकदार होते, आपके सभी तर्क अब भी लागू होते हैं। उपरोक्त वाक्य आपके लेख में पढ़ा तो मुझे अपनी इसी प्रविष्टि का निम्नलिखित लगभग ऐसा ही वाक्य याद आया। ये है मेरा वाक्य

    सबसे हैरत की बात यह लगी कि सामान्य तौर पर प्याज़ और आलू के दाम में बढ़त से भी परेशान हो जाने वाले लोग भूसंपत्ति की कीमत बढ़ने से खास चिंतित नहीं लगते थे।

    अद्भुत साम्य!