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कौन बनेगा श्रेष्ठ एग्रीगेटर?

By • Jan 20th, 2008 • Category: बातें तकनीकी

रवि भैया की इस हालिया पोस्ट पर एक चिट्ठाकार रचना की तल्ख टिप्पणी आई।

आप कि ये पोस्ट पढ़ कर सिर्फ ये समझ आया कि जो नये ब्लॉगर आये है आप सब पुराने वरिष्ठ ब्लोग्गेर्स के बीच वह केवल कुडा कबाड़ लिख रहें हैं, इसलिये उनको ना पढा जयाए। क्योंकी जो ब्लॉगर भी ऐसा खाता बना लेगे वह कभी नये ब्लॉगर को नहीं पढ़ेगे या पढ़ सकेगे। फिर वरिष्ठ ब्लॉगर समाज ये क्यो कहता है कि हम Hindi को बढावा दे रहें हैं या हम नये ब्लॉगर का स्वागत करते हैं। और कुडा कबाड़ का फैसला करना किस पंच का अधिकार है? क्या वाद विवाद करना कुडा कबाड़ मे आता है? या कुडा कबाड़ वह हैं जो हमे पसंद नहीं होता है।

रचना, आप भले इस पोस्ट को नये पुराने ब्लॉगर के घिसे पिटे तर्क में घसीट कर अपनी बात कह रही हैं मैंने इस पोस्ट को उसके आशय से जोड़ कर पढ़ने की ही कोशिश की। रवि तकनीक के जानकार हैं और यह उन्हें दो सींग प्रदान नहीं करता जिस के बल पर आप ब्लॉग में भी पृथकतावाद रोंपने और पुराने ब्लॉगरों को पानी पी पी कर कोसने लगें। उनका उद्देश्य रहता है इंटरनेट के प्रयोक्ताओं को सुझाव देना, नेट पर अपने काम को सरल बनाने के लिये, और यही उन्होंने इस पोस्ट में भी किया है। अगर बात समझ नहीं आई तो आगे पढ़ना अच्छा होगा।

aggregator.jpgइस बात से आँखें मूंद लेने से क्या यह असत्य हो जायेगा कि हिन्दी ब्लॉगों को पढ़ना क्रमशः दुश्कर होता जा रहा है? प्रतिदिन प्रकाशित प्रविष्टियों की संख्या के लिहाज़ से शायद कुछ महीनों में किसी मानव के लिये तो संभव न हो पायेगा सारे पोस्ट पढ़ कर टिपिया भी ले, ऐसे में फिल्टर कर अपने काम की पोस्ट निकालना ही होगी और कोई तंत्रांश ही ये मदद दे सकता है। जो पोस्ट आप नहीं पढ़ पा रहे वो कचरा ही तो है, पर ये कचरा क्या हो ये हर पाठक की निजी पसंद नापसंद पर तय होगी। साहित्य में रुचि रखने वाले कथा, कहानियाँ, कवितायें बाँचना चाहेंगे, मेरे जैसे तकनीक और समाचार विचार से जुड़े विषय छाँट कर पढ़ना चाहेंगे, आप कुछ और। जो आपके लिये कचरा पोस्ट हैं, मेरे काम की हो सकती है। इस बात पर राई का पहाड़ बनाने की क्या तुक है?

पिछले दिनों चिट्ठाकार पत्रसूची में क्षणिक चर्चा के उपरांत ही चिट्ठाजगत ने भारी बदलाव कर प्रविष्टियों का वर्गीकरण कर अपना मुखपृष्ठ ही बदल डाला। करीब दो माह पहले ही मैंने नारद की फीड अपने गूगल रीडर खाते से हटा दी थी, हर घंटे दर्जनों पोस्ट पढ़ने का धैर्य अब मुझ में नहीं रहा और ईमानदारी की बात है कि इतने पोस्ट पढ़ना समझदारी भी नहीं, कुछ और काम धाम न हो तो शर्तिया ये किया जा सकता था। तब से मैंने अपने पढ़ने का तरीका बदला और अब चिट्ठाजगत या नारद के मुखपृष्ठ पर दिन में एकाध बार घूम लिया करता था, शीर्षक या अंश देख कर जो जमें वो पोस्ट ही पूरी पढ़ता। पर चिट्ठाजगत ने इसमें एक क्लिक खामख्वाह बढ़ा दिया। जाहिर तौर पर मुझे भी अब ब्लॉगवाणी या नारद का सरल मुखपृष्ठ भाने लगा है।

मैं चिट्ठाजगत में पोस्ट के वर्गीकरण की सुविधा को खराब नहीं कहूंगा, पर ये तभी बढ़िया काम करेगी जब काफी संख्या में पाठक इस काम में मदद करें और विकीपीडीया जैसे उदाहरणों से पता चलता है कि कलेक्टिव विज़डम हमेशा सटीक नहीं होता। चिट्ठाजगत को मैं तकनीकी रूप से श्रेष्ठ मानता ही रहा हूँ पर इसमें सुविधा के हिसाब से कुछ बदलाव भी होने चाहिये। चिट्ठाजगत में अपनी पसंद के चिट्ठों के ताज़ा पोस्ट देखने की सुविधा है, जिसका ज़िक्र रवि भैया ने भी किया, पर ये पर्सनलाईज़ेशन के स्तर तक तभी पहुंचेगा जब टेक्नोराती की तरह लॉग्ड इन होने पर मुखपृष्ठ ही मेरा पृष्ठ बन जावे। श्रेष्ठ एग्रीगेटर बनने के लिये मेहनत काफी लगनी है, क्योंकि मेरी राय में मेरे एग्रीगेटर को मेरे बारे में काफी कुछ जानना होगा। मैं किस तरह के पोस्ट पर क्लिक करता हूँ यह जानकार क्या ये बुद्धिमतापूर्वक मिलते जुलते पोस्ट खोज नहीं ला सकता? पर यह तय करना इतना सरल भी नहीं है। ज़रूरी नहीं कि एक ही ब्लाग के हर पोस्ट मुझे पसंद आयें, भले वो टॉपीकल ब्लॉग हो। हमारी रीडिंग हैबिट बदलती रहती है और एग्रीगेटर द्वारा इसे ही ताड़ना ज़रूरी है। कुछ हद तक ये पोस्ट की टैग द्वारा संभव है, पर होशियार चिट्ठाकार अगर कैटरीना कैफ के चित्रों वाली पोस्ट को ‘हरि स्मरण’ टैग कर दें तो?

ऐसे में तंत्रांश को फोक्सोनॉमी और स्वचालित टैग निर्माण का मिला जुला तरीका इस्तेमाल करना होगा। याहू अपनी ऐसी ही टर्म एक्सट्रैक्शन एपीआई मुहैया कराती है, टैग्यू की ऐसी ही एक सेवा शायद अब बंद है। तीन साल पहले मैंने इस पर पोस्ट लिखी थी और तब यह यूनीकोड के लिये काम न करता था, आज की स्थिति पता नहीं। कह नहीं सकता कि हर पोस्ट से टैग निकाल पाना कितना संभव उपाय है, Noise यानी अवाँछित टैग को कई स्तरों पर हटाना होगा। जो भी हो, स्वचालित रूप से पोस्ट का सबब निकालना आसान ज़रूर हो जायेगा। इसके बाद पाठक के टैग-रीडिंग-पैटर्न से उसकी पसंद या अटेंशन प्रोफाईल का पता लगाना शायद आसान हो जाये।

पाठक के अटेंशन प्रोफाईल से पोस्ट के कीवर्ड का मिलान कर प्रविष्टियों को काफी हद तक सटीक रूप से फिल्टर किया जा सकेगा। और पाठक के पृष्ट पर उसके मतलब की पोस्ट वैसे ही परोसी जा सकेंगी जैसे गूगल या अन्य कंटेक्सट सेंसिटिव विज्ञापन सेवायें आपके पृष्ठ से कीवर्ड खोज कर उपयुक्त विज्ञापन पेश करती हैं। इस तरह का एक स्पेसीफिकेशन ए.पी.एम.एल पहले से ही मौजूद है, इसे ब्लॉगलाईंस जैसे न्यूज़रीडर अपनाने की भी सोच रहे हैं। ए.पी.एम.एल, ओ.पी.एम.एल की तरह ही एक क्षमल प्रारूप है। ओ.पी.एम.एल से ब्लॉगरोल, यानी आपके पसंदीदा चिट्ठों की सूची, बनाई जा सकती है। ए.पी.एम.एल के द्वारा आपके द्वारा देखे गये जाल पृष्ठों, आपके टैग, मनपसंद विडियो, संगीत, कड़ियाँ, आनलाईन शाँपिंग द्वारा खरीदी वस्तुओं, फीड से पढ़ी जा रही प्रविष्टियाँ आदि अनेक चीजों के आधार पर प्रोफाईल निर्मित होगी जो आपकी पसंद नापसंद का परिचायक होगी। ओ.पी.एम.एल पर अधिक जानकारी के साथ निरंतर पर एक विस्तृत लेख लिखने का निश्चय मैं कर चुका हूं, याद दिलाईयेगा।

नारद, ब्लॉगवाणी या चिट्ठाजगत में से जो भी ये सुविधा पहले उपलब्ध कराये, मेरी कंसल्टेंसी फीस देना न भूलियेगा ;), मेरी अमेज़ान विशलिस्ट यहाँ है

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14 टिप्पणीयाँ »

  1. आपके सुझाव बहुत अच्छे हैं. इन पर ध्यान देना ही चाहिये.

  2. आपने सही लिखा है कि तकनीकी ज्ञान होने का अर्थ यह कतई नहीं है कि किसी को सींग मिल गए हैं और वह भी प्रमाणित होना बाकी है.
    दीपक भारतदीप

  3. सही बातें, महाराज..

  4. good to have ur views

  5. मेरे ख्‍याल से यह भ्रमित बहस है. सारी दुनिया में किताबों के करोड़ों प्रकाशन होते हैं जो हर तरह के विषयों पर लिखी जाती हैं. क्‍या हमें सबके बारे में जानना होता है? नहीं. लेकिन किताबें पढ़ीं भी जाती हैं, खरीदी भी जाती हैं. चिट्ठों के संकलक से आखिर क्‍या अपेक्षा की जा रही है? क्‍या लोग उनसे अपनी जगह चिट्ठे पढ़ने का काम भी कराना चाहते हैं? तकनीक के झमेले में जबरन चिट्ठों को बहस का अखाड़ा बनाया जा रहा है. चिट्ठाजगत का क्‍लासिफिकेशन एक प्रयोग है. चल जाए तो और सुधार होंगे. लेकिन इससे किसी को क्‍या नुकसान है मैं नहीं समझ पा रहा.

  6. मेरी दूसरी तिपानी को याहं पर ना देकर आप ने केवल मारे विचारो का एक ही पक्ष रखा है दूसरा मे दे रही हूँ:

    Rachna Singh said… ब्लोग एक पर्सनल डाईरी है इसमे हम जो चाहेए लिख सकते ब्लोग मे ही ये सुविधा है की अपना लिखा किसी से पसंद नहीं करवाना होता है लिखो और तरंगों मे डालदो तरंगे जहाँ चाहेगी ले जयाएगी । बाक़ी इन तरंगों मे इतनी ताकत होती है कि ये अपने अंदर सब समा सकती है । मन के उदगार व्यक्त भी होगये और किसी से कुछ कहना भी नहीं पडा , यही है ब्लोग का असली मतलब । जो समझ लेते हैं वह इसे ऎन्जॉय करते है किसी ने आप को जब तक ईमेल से लिंक नहीं बेह्जा है तबतक उसका ब्लोग अगर आप पढ़ रहें तो आप उसकी “निज ” का अवलोकन कर रहें है । किसी के निज पर उंगली उठाना गलत है उसे कुडा कहना गलत है । आप ने ये headline जिस ब्लोग से ली है मे उसको भी पढे चुकी हूँ । तकनीक कि जानकारी के लिये आप सदेव ही हम सब से आगे हैं , इस पर किसे शक है पर ब्लोग का विभाजन प्रेमचंद और गुलशन नंदा के हिसाब नहीं हो सकता। ब्लोग का उपयोग अवश्य साहित्य रचाने के लिये हो सकता है पर ब्लोग व्यक्तिगत अभिव्क्ती का माध्यम है और हम जितना दूसरे कि डाईरी को “समझेगे ” उतना मानव भाव और उदगार को अपने अंदर समा सकेगे so read as many as we can without filtering the content 3:27 PM

    तकनीक की जानकारी जो रवि की पोस्ट मे दी गयी है वह बहुत पुरानी है और bilkul obselete है { मेरी नज़र}. पर किसी के लिखे को कचरा कहना उसके निज को अपमानित करना होता है. और इस पोस्ट की headline रवि कि अपनी नहीं है. इसके अलावा जब एक संवाद एक ब्लोग पर chal रहा है तो उस पर नयी पोस्ट बनाना आप वरिश्द ब्लोग्गेर्स की परिपाटी है लकिन जब कोई नया ब्लॉगर ऐसा करता है तो आप सब इसे गलत सिद्ध करते है और किस्सी भी कमेन्ट का उलेख करने से पहले अगर आप दोनो पक्षों को निष्पक्ष द्रष्टी से देखते तो सही होता। ब्लोग पर गुट बंदी करना सही नहीं है।

    “इस बात से आँखें मूंद लेने से क्या यह असत्य हो जायेगा कि हिन्दी ब्लॉगों को पढ़ना क्रमशः दुश्कर होता जा रहा है?”

    बस आप अभी से थक गये !!!!!!!!!!!! अभी तो Hindi ब्लोग्गिंग की शैशव अवस्था है। मेरा विचार है आप अपने ब्राउजर के फवोरितेस मे अपनी पसंद के ब्लोग सेव कर ले जो आप के अपने हो, बाक़ी को हम सब “रचना, आप भले इस पोस्ट को नये पुराने ब्लॉगर के घिसे पिटे तर्क में घसीट कर अपनी बात कह रही हैं ” घिसे पिटे तर्क वाले लोगे के लिये रहने दे ।

  7. देबूदा, नमस्कार, सही फरमाया आपने पर क्या किसी के भी चिट्ठे को कूड़ा-कबाड़ कहना अच्छा है। और रही बात पढ़ने की तो लोग अपनी रूचिनुसार लेखों का चयन कर पढ़ ही रहे हैं। सच बात है कि सभी लेखों को पढ़ना आसान नहीं है यह सब जानते हैं फिर अपने मनपसंद लेखों और चिट्ठाकारों को ही पढ़ा जाए या लोग पढ़ते ही हैं तो फिर इसके लिए नगाड़ा पीटने की क्या आवश्यकता है।

    लेखक सभी नहीं हो सकते पर ले-खक सभी हो सकते हैं। तो ले-खक को लेखक बनाना चिट्ठाकारिता का उद्देश्य होना चाहिए इसके लिए यह आवश्यक है कि बीच-बीच में किसी चिट्ठाकार के सभी नहीं तो कम से कम पच्चीस प्रतिशत लेखों को पढ़कर उसकी अच्छाई-बुराई से ले-खक को अवगत कराया जाए ताकि वह लेखक की ओर अग्रसर हो सके। किसी भी बड़े-बड़े लेखकों को देखें उनकी बहुत सारी रचनाओं में से कुछ ने ही उन्हे लेखक का दर्जा दिलवाया। देबूदा कम से कम मेरी दस रचनाओं में से एक तो पढ़ लिया कीजिए। अग्रिम धन्यवाद।

  8. धन्यवाद देबू भाई, आपने मेरे विचारों को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया. साथ ही एग्रीगेटरों को भविष्य के लिए रूप धरने में बहुत सी राहें सुझा दीं. उन्हें कंसल्टेंसी फ़ीस देना ही चाहिए. 🙂

  9. सत्य वचन.

  10. पढ़ने के लिये सभी का शुक्रिया!

    रचनाः आपकी टिप्पणी मेरे स्पैम फिल्टर में फंसी रह गई जिसे आज निकाला है। आपकी पूरी टिप्पणी प्रकाशित करने का मेरा कोई उद्देश्य नहीं था, अपने ही ब्लॉग पर क्या और कितना लिखना या उद्धत करना है इतनी छूट तो मुझे दें। आपकी बात को तोड़ा मरोड़ा नहीं गया इतना आपने पाया होगा।

    मुझे लगता है आपको इंटरनेट तकनीक पर और ज्ञान हासिल करना चाहिये ताकि रवि के सुझाव को obselete और 80 के दशक की बुकमार्किंग तकनीक को modern समझने की गलतफहमी दूर हो।

    बता दूं कि मैं किसी भी गुट में शामिल नहीं हूँ और ना ही गैर तकनीकी व तकनीकविद्द, या नये पुराने या लेफ्ट या राईटविंग वाले खेमेवाद में पड़ता हूँ। यहाँ भी उद्देश्य एक तकनीकी सुझाव देने का था, सो किया। मैं 2002 से ब्लॉगिंग में हूँ रचना और जितने अंग्रेज़ी चिट्ठे पढ़ता रहा हूँ उतने तो हिन्दी में कुल जमा अच्छे चिट्ठे तक नहीं हैं। तो मैं थका नहीं हूँ, पर मैं समझदारी से पढ़ने में भी यकीन रखता हूँ, और इसी तरह के सोच वालों ने एग्रीगेटर्स बनाये और इसकी तकनीक में सुधार लाने का प्रयास कर रहे हैं। हर कोई अच्छे चिट्ठे पढ़ना चाहता है और यह उसी काम को तकनीकी रूप से आसान बनाने की चेष्टा है।

    चुंकि आप अधिकाधिक चिट्ठे पढ़ना चाहती हैं तो आपको एग्रीगेटर्स का प्रयोग तो अवश्य सीखना चाहिये। बुकमार्किंग कर, हर ब्लॉग पर जाकर पढ़ना न समझदारी है और न ही efficient।

    प्रभाकरः मैं तो चिट्ठे का शीर्षक और मजमून देख कर पढ़ता हूँ तो कोई चिट्ठा मेरी रुचि का हो और समय मयस्सर हो तो छूटेगा नहीं। आपका चिट्ठा पढ़ता रहता हूँ। टिप्पणी करने में संकोच होता है पर कभी कभार साहस जुटा लेता हूँ।

    संजयः हर चीज़ में समय के साथ सुधार तो लाना ही चाहिये। चिट्ठाजगत के साथ साथ अन्य एग्रीगेटर्स को भी ये फोकट का सुझाव मैंने दिया यह सोचकर कि वे और उन्नत हों, सिर्फ मीन मेख निकालना तो उद्देश्य नहीं था।

  11. चिट्ठों की भीड़ में पठनीय पोस्ट का चयन करने में एग्रीगेटर तकनीकों के माध्यम से जिस हद तक पाठकों की मदद कर सके, सराहनीय और स्वागतयोग्य है।

    यदि कोई एग्रीगेटर अलग-अलग पाठकों की अभिरुचि का ट्रैक रखते हुए स्वचालित तरीके से संबंधित विषय पर उपलब्ध प्रविष्टियों को एक साथ प्रस्तुत कर सके, तो सोने में सुगंध जैसी बात होगी। बीबीसी हिन्दी और वेबदुनिया की साइट पर इस तरह की सुविधा पहले से है।

    एग्रीगेटरों की तकनीक में बेहतरी के बारे में आपके दूरदर्शी सुझावों पर अमल करने की पहल करने वाला एग्रीगेटर ही श्रेष्ठ एग्रीगेटर सिद्ध होगा।

  12. अभिव्यक्ति की आजादी सभी को है, अब ये बात किसी को अच्छी ना लगे तो कम से कम दुसरो के लिखे पर (जो कि निस्वार्थ भाव से परसेवाहिताय लिखा गया हो), विवाद खडा करना उचित नही है! एवं विशेषकर अगर लेख तकनीकी हो तो तकनीक पर आधारित खामियॉ निकालें ना कि शब्दों पर आधारित विवाद।

  13. मेरी उपर्युक्त टिप्पणी में “बीबीसी हिन्दी और वेबदुनिया की साइट पर इस तरह की सुविधा पहले से है” के संदर्भ में यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि उन साइटों में अलग-अलग पाठकों की अभिरुचि का ट्रैक रखते हुए लेख प्रस्तुत नहीं किये जाते। लेकिन जिस विषय पर आप कोई लेख पढ़ रहे हों, उनसे संबंधित अन्य लेखों के लिंक भी स्वत: उसी पृष्ठ पर आ जाते हैं। पाठकों के लिए यह एक बड़ी सुविधा है, पूरे मामले को समझने के लिए, पिछले संदर्भों से परिचित होने के लिए, किसी परिघटना के विकास-क्रम को जानने के लिए।

    क्या एग्रीगेटर यह कर सकते हैं कि किसी विषय विशेष से संबंधित विभिन्न ब्लॉगों पर आई सभी प्रविष्टियों को प्रासंगिकता और उनके प्रकाशन की तारीख के क्रम में प्रस्तुत कर सकें?

  14. कुछ समझे , कुछ नहीं समझे । हम हैं तकनीकी अज्ञानी । देबूभाई इसे अच्छी तरह जानते हैं।
    देबूभाई के संतुलित और समझदारी भरे लेखन को सराहते हैं हम।